Translate

शनिवार, 13 दिसंबर 2025

कुपात्र के हाथों में ज्योतिष शास्त्र के जाने के दुष्परिणाम" —

बहुत समय पहले की बात है, एक व्यक्ति के दो पुत्र थे । वह उन दोनों की जन्मकुंडली लेकर एक अधकचरे ज्योतिषी के पास गया । उस अधकचरे ज्योतिषी को ज्योतिष शास्त्र का जितना ज्ञान था उसके आधार पर उसने उस व्यक्ति के उन दोनों पुत्रों की जन्मकुंडलियों का विश्लेषण करके यह भविष्यवाणी की— "तुम्हारा छोटा पुत्र ही तुम्हारी सेवा करेगा न कि ज्येष्ठ पुत्र ।"


ज्योतिषी की यह बात उस व्यक्ति ने अपने मन में गांठ की तरह बांध ली । धीरे–धीरे समय व्यतीत होता गया और उस व्यक्ति का छोटा पुत्र उद्दंड पर उद्दंड होता गया । वह सदा अपने बड़े भाई को अपमानित करता रहता था परन्तु उस ज्योतिषी की बात को अपने अंतःकरण में दबाए हुए वह पिता अपने छोटे पुत्र की गलती होने पर भी सदा अपने बड़े पुत्र को ही फटकारता था ।

उस व्यक्ति का ज्येष्ठ पुत्र बचपन से ही अपने पिता के इस दुर्व्यवहार और अन्याय को सहन करता रहता और इसी आशा में जीता कि एक दिन उसके पिता उसको समझेंगे और कभी न कभी तो उनका हृदय उसके लिए पिघलेगा । समय बीतता गया और जब वर्षों तक ऐसा न हो सका तो उसने अपने पिता से विद्रोह कर दिया ।

इस बीच छोटा पुत्र उन दोनों पिता-पुत्र के मध्य लगी इस आग में और घी डालकर आनंद लेता रहा तथा उसकी नीयत अपने पिता व पूर्वजों की संपत्ति पर भी खराब हो चली । अति तो तब हो गई जब उसकी पत्नी भी उसके इस खेल में सम्मिलित हो गई और इस प्रकार से इस अन्याय भरे वातावरण को देखकर उस व्यक्ति का ज्येष्ठ पुत्र मन से अपने पिता से पूर्णतः विमुख हो गया ।

अपने पिता और कुटुम्ब के द्वारा किए गए इस अन्याय से अंतःकरण तक दुःखी हुए उस पुत्र ने एक दिन बालक ध्रुव की कथा पढ़ी और उसने भी बालक ध्रुव की भांति यह निश्चय किया कि हाड़ मांस से बने हुए उसके पिता से महान गोद ईश्वर की होती है अतः अब उसे भी वही प्राप्त करनी है और उसने अपना जीवन धर्म और ईश्वर भक्ति को समर्पित कर दिया ।

कलियुगी माता-पिता भले ही अपनी संतानों के साथ अन्याय करते हों परन्तु ईश्वर कभी भी अपनी किसी संतान के साथ भेदभाव नहीं करते । समय का चक्र ऐसा लगा कि ईश्वर की तपस्या और अपने भाग्य की कृपा से वह ज्येष्ठ पुत्र एक प्रसिद्ध व्यक्ति बनकर सभी ओर से यश, धन और सम्मान प्राप्त करने लगा । इधर इस व्यक्ति का छोटा पुत्र अनेक व्यसनों में पड़ गया और मदिरा की बुरी लत के कारण वह अपने उसी पिता के साथ प्रतिदिन अभद्र व्यवहार करने लगा, जिसने उसके गलत होते हुए भी सदा उसी का पक्ष लिया था ।

इतना सब होने के पश्चात् भी उस मूर्ख व्यक्ति के अवचेतन मन से कोई यह बात नहीं निकाल सका कि "तुम्हारी सेवा तो तुम्हारा छोटा पुत्र ही करेगा ।"

वह व्यक्ति प्रतिदिन अपने छोटे पुत्र से अपमानित होता और अगले दिन के सूर्योदय के साथ अपने भीतर नवीन ऊर्जा भरकर पुनः यही विचार करता कि मेरी तो सेवा, मेरा यही छोटा पुत्र करेगा और इस प्रकार से दिन व्यतीत होते रहे और वह व्यक्ति इसी आशा में जीता रहा कि मेरा ये छोटा पुत्र एक दिन अपने सभी व्यसनों को छोड़कर मेरी सेवा करेगा ।

वर्षों पहले की गई एक गलत भविष्यवाणी ने एक पूरा परिवार नष्ट कर दिया और उस व्यक्ति ने स्वयं अपने ही हाथों अपना योग्य ज्येष्ठ पुत्र खो दिया जो कि मन से अच्छा होने के उपरांत भी अपने पिता द्वारा किए गए दुर्व्यवहार और अन्याय को कभी भूल नहीं सका और उनसे दूर चला गया ।

यदि इन दोनों ही पुत्रों की जन्मकुंडली की बात करें तो ज्येष्ठ पुत्र की जन्म कुंडली में द्वितीय भाव (कुटुंब स्थान) में शत्रु राशि का राहु था, जिसके कारण उसे कुटुंब से सदा छल प्राप्त हुआ और उसे कुटुंब का सुख भी प्राप्त न हो सका इसके विपरीत छोटे पुत्र की जन्मकुंडली में कुटुंब स्थान का स्वामी शनि उच्च का होकर लाभ स्थान में स्थित था, जिसके कारण हर प्रकार की दुष्टता करने के उपरान्त भी उसे कुटुंब से सभी प्रकार का लाभ प्राप्त हुआ ।

इस कहानी से सभी महानुभाव यह विचार करें कि इसमें महान ज्योतिष शास्त्र की त्रुटि है, उस मूर्ख व्यक्ति की जिसने अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग करने के स्थान पर एक अधकचरे ज्योतिषी की बात मानी अथवा उस अधकचरे ज्योतिषी की, जिसने इस प्रकार की भविष्यवाणी की ?

मेरे विचार से यदि आधी गलती उस अधकचरे ज्योतिषी की है जिसने ऐसी भविष्यवाणी करके एक बालक का जीवन कष्टों में डाला तो आधी गलती उस मूर्ख व्यक्ति की भी है जो उस ज्योतिषी के द्वारा की गई नकारात्मक भविष्यवाणी को सत्य घटित करने में तो अपनी समस्त ऊर्जा लगाता रहा परन्तु उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र के अंतःकरण को कभी भी समझने का प्रयास नहीं किया ।

अब बात करते हैं उस ज्योतिषी के द्वारा इस कुंडली में की गई भूल की, तो उस ज्योतिषी को कहना यह चाहिए था कि— आपके ज्येष्ठ पुत्र की जन्मकुंडली के द्वितीय भाव (कुटुंब स्थान) में राहु का पृथक् करने वाला पाप प्रभाव है अतः आपको उसके साथ कभी भी छल पूर्वक व्यवहार नहीं करना चाहिए अन्यथा वह आपसे पृथक् होकर कहीं दूर चला जाएगा और आपके छोटे पुत्र की जन्मकुंडली में शनि द्वितीय भाव का स्वामी होकर लाभ स्थान में उच्च का होकर स्थित है अतः उसको सदा अपने कुटुम्ब से लाभ प्राप्त होता रहेगा ।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि ज्योतिष शास्त्र का पूर्ण ज्ञान हुए बिना कभी भी किसी के लिए अशुभ शब्द मुख से नहीं निकालना चाहिए । 

शास्त्र कहते हैं कि—
अदृष्टा शास्त्रकथनं ब्रह्महत्यैव गीयते। 
[बृहद्धर्म पुराण, उत्तरखण्ड २०।६]
जो व्यक्ति बिना शास्त्रों को ठीक से देखे ही उनके विषय में कथन दे देता है, उसके इस पाप को ब्रह्महत्या के समान समझना चाहिए ।

वर्तमान में भी लोग यूँ ही— आचार नियम, औषधियां, ज्योतिषीय तथ्य, सदाचार और धर्माधर्म का निर्णय आदि बिना शास्त्र वचन उद्धृत किये लिखते बताते रहते हैं, क्योंकि शास्त्र जानते नहीं; किन्तु शास्त्रो़ में ही कहा गया है कि उक्त बातें बिना शास्त्रवचन का प्रमाण दिये यदि कोई निर्दिष्ट करता है तो उसे ब्रह्महत्या का महापाप लगता है —
प्रायश्चितं चिकित्सा च ज्योतिषे धर्मनिर्णयम्।
विना शास्त्रेण यो ब्रूयात् तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
[ नारदमहापुराण, पूर्व० १२।६४ ]

महर्षि वाधूल भी कहते हैं कि—
 धर्म के सूक्ष्मतत्त्व को जाने बिना जो कोई मनमाना निर्णय देता है और अन्यथा ही प्रायश्चित्त बतलाता है तो पापी व्यक्ति का वह पाप सौगुना होकर निर्णय देने वाले व्यक्ति के मुख में प्रविष्ट हो जाता है ।
(वाधूलस्मृति १७६ - १७७)
"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava