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शनिवार, 13 दिसंबर 2025

कुपात्र के हाथों में ज्योतिष शास्त्र के जाने के दुष्परिणाम" —

बहुत समय पहले की बात है, एक व्यक्ति के दो पुत्र थे । वह उन दोनों की जन्मकुंडली लेकर एक अधकचरे ज्योतिषी के पास गया । उस अधकचरे ज्योतिषी को ज्योतिष शास्त्र का जितना ज्ञान था उसके आधार पर उसने उस व्यक्ति के उन दोनों पुत्रों की जन्मकुंडलियों का विश्लेषण करके यह भविष्यवाणी की— "तुम्हारा छोटा पुत्र ही तुम्हारी सेवा करेगा न कि ज्येष्ठ पुत्र ।"


ज्योतिषी की यह बात उस व्यक्ति ने अपने मन में गांठ की तरह बांध ली । धीरे–धीरे समय व्यतीत होता गया और उस व्यक्ति का छोटा पुत्र उद्दंड पर उद्दंड होता गया । वह सदा अपने बड़े भाई को अपमानित करता रहता था परन्तु उस ज्योतिषी की बात को अपने अंतःकरण में दबाए हुए वह पिता अपने छोटे पुत्र की गलती होने पर भी सदा अपने बड़े पुत्र को ही फटकारता था ।

उस व्यक्ति का ज्येष्ठ पुत्र बचपन से ही अपने पिता के इस दुर्व्यवहार और अन्याय को सहन करता रहता और इसी आशा में जीता कि एक दिन उसके पिता उसको समझेंगे और कभी न कभी तो उनका हृदय उसके लिए पिघलेगा । समय बीतता गया और जब वर्षों तक ऐसा न हो सका तो उसने अपने पिता से विद्रोह कर दिया ।

इस बीच छोटा पुत्र उन दोनों पिता-पुत्र के मध्य लगी इस आग में और घी डालकर आनंद लेता रहा तथा उसकी नीयत अपने पिता व पूर्वजों की संपत्ति पर भी खराब हो चली । अति तो तब हो गई जब उसकी पत्नी भी उसके इस खेल में सम्मिलित हो गई और इस प्रकार से इस अन्याय भरे वातावरण को देखकर उस व्यक्ति का ज्येष्ठ पुत्र मन से अपने पिता से पूर्णतः विमुख हो गया ।

अपने पिता और कुटुम्ब के द्वारा किए गए इस अन्याय से अंतःकरण तक दुःखी हुए उस पुत्र ने एक दिन बालक ध्रुव की कथा पढ़ी और उसने भी बालक ध्रुव की भांति यह निश्चय किया कि हाड़ मांस से बने हुए उसके पिता से महान गोद ईश्वर की होती है अतः अब उसे भी वही प्राप्त करनी है और उसने अपना जीवन धर्म और ईश्वर भक्ति को समर्पित कर दिया ।

कलियुगी माता-पिता भले ही अपनी संतानों के साथ अन्याय करते हों परन्तु ईश्वर कभी भी अपनी किसी संतान के साथ भेदभाव नहीं करते । समय का चक्र ऐसा लगा कि ईश्वर की तपस्या और अपने भाग्य की कृपा से वह ज्येष्ठ पुत्र एक प्रसिद्ध व्यक्ति बनकर सभी ओर से यश, धन और सम्मान प्राप्त करने लगा । इधर इस व्यक्ति का छोटा पुत्र अनेक व्यसनों में पड़ गया और मदिरा की बुरी लत के कारण वह अपने उसी पिता के साथ प्रतिदिन अभद्र व्यवहार करने लगा, जिसने उसके गलत होते हुए भी सदा उसी का पक्ष लिया था ।

इतना सब होने के पश्चात् भी उस मूर्ख व्यक्ति के अवचेतन मन से कोई यह बात नहीं निकाल सका कि "तुम्हारी सेवा तो तुम्हारा छोटा पुत्र ही करेगा ।"

वह व्यक्ति प्रतिदिन अपने छोटे पुत्र से अपमानित होता और अगले दिन के सूर्योदय के साथ अपने भीतर नवीन ऊर्जा भरकर पुनः यही विचार करता कि मेरी तो सेवा, मेरा यही छोटा पुत्र करेगा और इस प्रकार से दिन व्यतीत होते रहे और वह व्यक्ति इसी आशा में जीता रहा कि मेरा ये छोटा पुत्र एक दिन अपने सभी व्यसनों को छोड़कर मेरी सेवा करेगा ।

वर्षों पहले की गई एक गलत भविष्यवाणी ने एक पूरा परिवार नष्ट कर दिया और उस व्यक्ति ने स्वयं अपने ही हाथों अपना योग्य ज्येष्ठ पुत्र खो दिया जो कि मन से अच्छा होने के उपरांत भी अपने पिता द्वारा किए गए दुर्व्यवहार और अन्याय को कभी भूल नहीं सका और उनसे दूर चला गया ।

यदि इन दोनों ही पुत्रों की जन्मकुंडली की बात करें तो ज्येष्ठ पुत्र की जन्म कुंडली में द्वितीय भाव (कुटुंब स्थान) में शत्रु राशि का राहु था, जिसके कारण उसे कुटुंब से सदा छल प्राप्त हुआ और उसे कुटुंब का सुख भी प्राप्त न हो सका इसके विपरीत छोटे पुत्र की जन्मकुंडली में कुटुंब स्थान का स्वामी शनि उच्च का होकर लाभ स्थान में स्थित था, जिसके कारण हर प्रकार की दुष्टता करने के उपरान्त भी उसे कुटुंब से सभी प्रकार का लाभ प्राप्त हुआ ।

इस कहानी से सभी महानुभाव यह विचार करें कि इसमें महान ज्योतिष शास्त्र की त्रुटि है, उस मूर्ख व्यक्ति की जिसने अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग करने के स्थान पर एक अधकचरे ज्योतिषी की बात मानी अथवा उस अधकचरे ज्योतिषी की, जिसने इस प्रकार की भविष्यवाणी की ?

मेरे विचार से यदि आधी गलती उस अधकचरे ज्योतिषी की है जिसने ऐसी भविष्यवाणी करके एक बालक का जीवन कष्टों में डाला तो आधी गलती उस मूर्ख व्यक्ति की भी है जो उस ज्योतिषी के द्वारा की गई नकारात्मक भविष्यवाणी को सत्य घटित करने में तो अपनी समस्त ऊर्जा लगाता रहा परन्तु उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र के अंतःकरण को कभी भी समझने का प्रयास नहीं किया ।

अब बात करते हैं उस ज्योतिषी के द्वारा इस कुंडली में की गई भूल की, तो उस ज्योतिषी को कहना यह चाहिए था कि— आपके ज्येष्ठ पुत्र की जन्मकुंडली के द्वितीय भाव (कुटुंब स्थान) में राहु का पृथक् करने वाला पाप प्रभाव है अतः आपको उसके साथ कभी भी छल पूर्वक व्यवहार नहीं करना चाहिए अन्यथा वह आपसे पृथक् होकर कहीं दूर चला जाएगा और आपके छोटे पुत्र की जन्मकुंडली में शनि द्वितीय भाव का स्वामी होकर लाभ स्थान में उच्च का होकर स्थित है अतः उसको सदा अपने कुटुम्ब से लाभ प्राप्त होता रहेगा ।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि ज्योतिष शास्त्र का पूर्ण ज्ञान हुए बिना कभी भी किसी के लिए अशुभ शब्द मुख से नहीं निकालना चाहिए । 

शास्त्र कहते हैं कि—
अदृष्टा शास्त्रकथनं ब्रह्महत्यैव गीयते। 
[बृहद्धर्म पुराण, उत्तरखण्ड २०।६]
जो व्यक्ति बिना शास्त्रों को ठीक से देखे ही उनके विषय में कथन दे देता है, उसके इस पाप को ब्रह्महत्या के समान समझना चाहिए ।

वर्तमान में भी लोग यूँ ही— आचार नियम, औषधियां, ज्योतिषीय तथ्य, सदाचार और धर्माधर्म का निर्णय आदि बिना शास्त्र वचन उद्धृत किये लिखते बताते रहते हैं, क्योंकि शास्त्र जानते नहीं; किन्तु शास्त्रो़ में ही कहा गया है कि उक्त बातें बिना शास्त्रवचन का प्रमाण दिये यदि कोई निर्दिष्ट करता है तो उसे ब्रह्महत्या का महापाप लगता है —
प्रायश्चितं चिकित्सा च ज्योतिषे धर्मनिर्णयम्।
विना शास्त्रेण यो ब्रूयात् तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
[ नारदमहापुराण, पूर्व० १२।६४ ]

महर्षि वाधूल भी कहते हैं कि—
 धर्म के सूक्ष्मतत्त्व को जाने बिना जो कोई मनमाना निर्णय देता है और अन्यथा ही प्रायश्चित्त बतलाता है तो पापी व्यक्ति का वह पाप सौगुना होकर निर्णय देने वाले व्यक्ति के मुख में प्रविष्ट हो जाता है ।
(वाधूलस्मृति १७६ - १७७)
"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava

शनिवार, 6 सितंबर 2025

चन्द्रग्रहण सितम्बर २०२५


७ सितम्बर २०२५ को चन्द्रग्रहण लगने जा रहा है जो भारत में भी दृष्टिगोचर होगा, इस कारण से भारत में इसके सूतक मान्य होंगे तथा सभी जातकों पर इसका भौतिक व आध्यात्मिक प्रभाव पड़ेगा । यह चन्द्रग्रहण, शनि की राशि 'कुंभ' और बृहस्पति के नक्षत्र 'पूर्वभाद्रपद' में लगेगा ।
आप सभी के लिए ग्रहण सम्बन्धित कुछ विशेष जानकारियां यहां उपलब्ध करवाने जा रहा हूँ —

ग्रहण के सूतक लगने से पूर्व ही घर के मंदिरों में स्थित यंत्र-कवच तथा गले या हाथ में बंधे हुए अभिमंत्रित किए हुए गंडे-कवच आदि उतार कर उन्हें कुशा के भीतर छुपा कर रख देना चाहिए तथा अगले दिन सूर्योदय के पश्चात् गंगाजल आदि से धोकर उन्हें अपने-अपने स्थानों पर पुनः प्रतिष्ठित करना चाहिए ।

घर के मंदिरों को भी सूतक लगने से पूर्व किसी मोटे वस्त्र आदि से ढक देना चाहिए और जब ग्रहण समाप्त हो जाए तो मूर्तियों को कुशा मिश्रित गंगाजल से स्नान करवाना चाहिए । यदि किसी के यहां मूर्ति न होकर चित्र हों तो उन पर इस कुशायुक्त जल के छींटे मारने चाहिए ।

जब ग्रहण समाप्त हो जाए तो घर की धुलाई-सफाई तो आप सभी करते ही हैं परन्तु कुछ लोग ग्रहण समाप्त होते ही भोजन कर लेते हैं जबकि भोजन उन्हें आगामी दिन के सूर्योदय के उपरान्त ही करना चाहिए ।


सूतकों में पूजा पाठ, अधिक कोलाहल, मूर्ति स्पर्श, भोजन, शयन आदि का निषेध है । इस समय पृथ्वी अधिक संवेदनशील हो जाती है और यदि अधिक कोलाहल किया जाए तो ब्रह्म चेतना कुपित होकर जीव को दंड दे देती है तथा हानिकारक जीवाणुओं एवं विषाणुओं की संख्या में अत्यधिक वृद्धि होने से घर के साथ-साथ वहां रखें भोज्य पदार्थ इत्यादि भी दूषित हो जाते हैं, ऐसे में ग्रहण समाप्त हो जाने के बाद गंगाजल - गोमूत्र से घर की शुद्धि करके अगले दिन सूर्योदय के पश्चात् नया बनाया गया भोजन ही ग्रहण करना चाहिए ।

सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक 'अरुन्तुद' नरक में वास करता है । सूर्यग्रहण में ग्रहण चार प्रहर (१२ घंटे) पूर्व और चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर (९ घंटे) पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए । बच्चे, वृद्ध और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं ।

ग्रहण के स्पर्श के समय स्नान, मध्य के समय होम, देव-पूजन और अंत में सचैल (वस्त्रसहित) स्नान तथा दान करना चाहिए । ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए तथा स्वयं भी वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए ।

ग्रहण के स्नान में कोई मंत्र नहीं बोलना चाहिए । ग्रहण के स्नान में गरम जल की अपेक्षा ठंडा जल, ठंडे जल में भी दूसरे के हाथ से निकाले हुए जल की अपेक्षा अपने हाथ से निकाला हुआ, निकाले हुए की अपेक्षा भूमि में भरा हुआ, भरे हुए की अपेक्षा बहता हुआ, बहते हुए की अपेक्षा सरोवर का, सरोवर की अपेक्षा नदी का, अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा का और गंगा की अपेक्षा भी समुद्र का जल पवित्र माना जाता है ।

ग्रहण के अंत में गायों को घास , पक्षियों को अन्न, चींटियों को भोजन, ब्राह्मणों को वस्त्र, अन्न तथा दक्षिणा आदि का दान करने से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है ।

ग्रहण के समय कोई भी शुभ व नया कार्य आरंभ नहीं करना चाहिए । ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है । गर्भवती स्त्रियों को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए ।

भगवान् वेदव्यासजी ने परम् हितकारी वचन कहे हैं— 'सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्यग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है । यदि गंगाजल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है ।

ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। (स्कन्द पुराण), भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिए। (देवी भागवत), अस्त के समय सूर्य और चन्द्रमा को रोगभय के कारण नहीं देखना चाहिए। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्णजन्म खं. ७५.२४)

ग्रहण का स्पर्श होते ही उसके सूतक समाप्त हो जाते हैं और मंत्र जप, स्तोत्र पाठ आदि करने का समय आरंभ हो जाता है । ग्रहणकाल और सूतक में यही भेद होता है कि सूतक काल में पूजा-पाठ वर्जित होता है जबकि ग्रहणकाल साधना के लिए सर्वोत्तम समय होता है । ग्रहणकाल में साधना पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके ही करनी चाहिए ।

गर्दन तक जल में खड़े होकर यदि कोई मंत्र साधना करता है तो उसका फल अमोघ होता है, यह कार्य किसी नदी तीर्थ आदि पर हो तो और भी उत्तम होता है, ऐसे में तीर्थ स्थल के अभाव में कुछ साधक अपने घरों में जल की टंकी में जल भरकर रख लेते हैं तथा उसमें गर्दन तक खड़े होकर मंत्र का जप करते हैं, यह बहुत ही उत्तम कार्य है । विद्वान मनुष्यों को ऐसा ही करना चाहिए ।

ग्रहण काल में देवी-देवताओं द्वारा पृथ्वी पर भेजी जाने वाली शक्तियां क्षीण पड़ जाती हैं और चारों ओर नकारात्मक ऊर्जाओं का दुष्प्रभाव फैल जाता है, ऐसे में जो मनुष्य देवी-देवताओं के मंत्र का जप इत्यादि करता है, इससे उस मंत्र से सम्बंधित देवी-देवताओं की बाधित ऊर्जा सीधे उस मनुष्य से अत्यन्त तीव्रता के साथ जुड़ने लगती है । यही कारण है कि किसी भी अन्य काल की अपेक्षाकृत ग्रहण काल में मंत्र बहुत तीव्रता और शीघ्रता से सिद्ध हो जाता है ।

ग्रहण काल में राहु-केतु के मंत्र जप करने से बचना चाहिए क्योंकि उन्हीं की शक्तियों के कारण देव शक्तियों को कष्ट प्राप्त हो रहा होता है, ऐसे में हमें राहु-केतु के मंत्रों का जप करके उनकी शक्तियां नहीं बढ़ानी चाहिए तथा उसके स्थान पर उनके अधिष्ठात्री देवी-देवता, भगवती दुर्गा तथा भगवान् शंकर के मंत्रों का जप करना चाहिए ।

एक बार मंत्र सिद्धि हो जाने पर वह मंत्र जपना छोड़ना नहीं चाहिए, ग्रहण काल में सिद्ध किए हुए मंत्र का जितना अधिक जप किया जाता है , उस मंत्र के फल देने की क्षमता उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है ।

जो साधक किसी परम्परा प्राप्त गुरु द्वारा दीक्षित नहीं हैं, उन्हें मंत्रों का जप करने के स्थान पर उच्च कोटि के देवी–देवताओं के शक्तिशाली स्त्रोतों का संस्कृत में पाठ करना चाहिए । जिन्हें संस्कृत नहीं आती वह सुंदरकांड अथवा हनुमान चालीसा आदि का पाठ करके उसे अपने लिए सिद्ध कर सकते हैं । 

स्मरण रहे कि जो साधक जिस साधना में अधिकृत है, वह अपने अधिकार की सीमा में आने वाले मंत्रों का अनुष्ठान करके ही सिद्धि अथवा मुक्ति प्राप्त कर सकता है । अपने अधिकार की सीमा का अतिक्रमण करके इधर-उधर से प्राप्त किया हुआ मंत्र उस अनधिकृत व्यक्ति का उत्थान करने के स्थान पर उल्टा विनाश ही करता है । अतः किसी भी प्रकार के प्रमाद में न पड़कर शास्त्रों में वर्णित अपने अधिकार की सीमा में आने वाले मंत्रों का ही जप करें । 

मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखने वाले वेदपाठी ब्राह्मणों को ग्रहणकाल में शाबर मंत्रों को सिद्ध करने से बचना चाहिए तथा उसके स्थान पर गायत्री-महामृत्युंजय-श्रीविद्या-दस महाविद्या जैसी उच्च कोटि की विद्याओं के मंत्रों को सिद्ध करने का प्रयास करना चाहिए ।

विशेष— इस चन्द्रग्रहण के प्रभाव से विश्वभर में आगामी डेढ़ माह तक विभिन्न स्थानों पर शक्तिशाली भूकंप तथा सुनामी आने का भय बना रहेगा । बृहस्पति के नक्षत्र पर ग्रहण लगने के कारण आगामी डेढ़ माह के भीतर किसी बड़े धर्मगुरु की मृत्यु अथवा मृत्यु तुल्य कष्ट का समाचार प्राप्त होगा ।

"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

पशुपालन और धर्म

 "भौतिक सर्वोच्च न्यायालय" द्वारा कुत्तों से सम्बंधित विषय में निर्णय आने के पश्चात् समूचे भारत में कुत्ता प्रेमियों तथा विरोधियों के मध्य विवाद बढ़ गया है । इस विषय में धर्म शास्त्र क्या कहते हैं ? आइए जानते हैं—


पशुपालन सम्बन्धी धर्मशास्त्रीय नियम—
मार्जारकुक्कुटच्छागश्ववराहविहङ्गमान्।
पोषयन्नरकं याति तमेव द्विजसत्तम॥ (विष्णुपुराण २।६।२१; ब्रह्मपुराण २२ । २०)

कुक्कुटश्वानमार्जारान् पोषयन्ति दिनत्रयम्।
इह जन्मनि शूद्रत्वं मृतः श्वा चाभिजायते॥ (वाधूलस्मृति १७०)
बिल्ली, मुर्गा, बकरा, कुत्ता, सूअर तथा पक्षियों को पालने वाला मनुष्य नरक (कृमिपूय या पूयवह) में गिरता है।

स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति धिष्ण्यमिष्टापूर्त क्रोधवशा हरन्ति।
ततो विचार्य क्रियतां धर्मराज त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति।। (महाभारत, महाप्रस्थानिक० ३।१०)
कुत्ता रखने वालों के लिये स्वर्ग लोक में स्थान नहीं है । उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवाने का जो पुण्य होता है, उसे 'क्रोधवश' नामक राक्षस हर लेते हैं ।


कुक्कुटे शुनके चैव हविर्नाश्नन्ति देवताः। (महाभारत, अनु० १२७।१६)
घर में मुर्गे और कुत्ते के रहने पर देवता उस घर में हविष्य ग्रहण नहीं करते ।
    

चाण्डालश्च वराहश्च कुक्कुटः श्वा तथैव च।
रजस्वला च षण्डश्च नेक्षेरन्नश्नतो द्विजान्॥
होमे प्रदाने भोज्ये च यदेभिरभिवीक्ष्यते।
दैवे हविषि पित्र्ये वा तद्गच्छत्ययथातथम्॥ (मनुस्मृति ३। २३९-२४०)
यदि कुत्ते, सूअर और मुर्गे की दृष्टि पड़ जाय तो देवपूजन, श्राद्ध- तर्पण, ब्राह्मण-भोजन, दान और होम-ये सब निष्फल हो जाते हैं।

मार्जारश्च   गृहे  यस्य  सोऽप्यन्त्यजसमो  नरः ।
  भोजयेद्यस्तु विप्रेन्द्रान् मार्जारान् सन्निधौ यदि ।।
   तच्चाण्डालसमं  ज्ञेयं  नात्र कार्या  विचारणा ।।
जिस घर में बिल्ली रहती है वह चाण्डाल के समान होता है । यदि कोई मनुष्य बिल्ली की सन्निधि में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराता है - तो उसे चाण्डाल के समान जानना चाहिए ।

अजाश्वानखरोष्ट्राणां मार्जनात्तुषरेणुकान् ।
   संस्पृशेद्यदि मूढात्मा श्रियं हन्ति हरेरपि ।। "
यदि कोई मूढ बुद्धिवाला (मनुष्य ) बकरी - कुत्ता - गधा - ऊंट आदि से उठी हुई धूल अथवा झाडू लगाने से उठी हुई धूल का स्पर्श करता है—तो उसकी लक्ष्मी नष्ट हो जाती है, फिर चाहे वह विष्णु ही क्यों न हों।


  गावो देवाः सदा रक्ष्याः पाल्याः पोष्याच सर्वदा। (बृहत्पराशरस्मृति ५। २३)
गौओं का सदा दान करना चाहिये, सदा उनकी रक्षा करनी चाहिये और सदा उनका पालन-पोषण करना चाहिये ।

गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः।
तस्मै तुष्टा: प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान्॥ (महाभारत, अनु० ८१।३३)
गोषु भक्त लभते यद् यदिच्छति मानवः।
स्त्रियोऽपि भक्ता या गोषु ताश्च काममवाप्नुयु:॥
पुत्रार्थी लभते पुत्र कन्यार्थी तामवाप्नुयात्।
धनार्थी लभते वित्तं धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात्॥
विद्यार्थी चाप्नुयाद् विद्यां सुखार्थी प्राप्नुयात् सुखम्।
न किञ्चिद् दुर्लभ चैव गवा भक्तस्य भारत। (महाभारत, अनु० ८३।५०-५२)
जो मनुष्य गौओं की सेवा करता है, उसे गौएँ अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान करती हैं। वह गौभक्त मनुष्य पुत्र, धन, विद्या, सुख आदि
जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त हो जाती है। उसके लिये कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होती ।

निविष्ट गोकुल यत्र श्वास मुञ्चति निर्भयम्।
विराजयति तं देशं पापं चास्यापकर्षति॥ (महाभारत, अनु०५१। ३२)
गौओं का समुदाय जहाँ बैठकर निर्भयतापूर्वक साँस लेता है, उस स्थान के सारे पापों को खींच लेता है ।

यस्यैकापि गृहे नास्ति धेनुर्वत्सानुचारिणी ॥
मङ्गलानि कुतस्तस्य कुत्तस्तस्य तमः क्षय:। (अत्रिसंहिता २१८-२१९)
जिसके घर में बछड़े सहित एक भी गौ नहीं है, उसका मंगल कैसे होगा और उसके पापों का नाश कैसे होगा?

‘गौएँ स्वर्ग की सीढ़ियाँ हैं, गौएँ स्वर्ग में भी पूजी जाती हैं, गौएँ समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली देवियाँ हैं, उनसे बढ़कर और कोई श्रेष्ठ वस्तु नहीं है।'
—(महाभारत, अनु० ५१ । ३३)

'जिसके घर में बछड़े सहित एक भी गौ नहीं है, उसका मंगल कैसे होगा और उसके पापों का नाश कैसे होगा ?"
—(अत्रिसंहिता २१८ - २१९ )

'राजन्! जो प्यास से व्याकुल गायों के जल पीने में विघ्न डालता है, उसे ब्रह्महत्यारा समझना चाहिये।'
—(महाभारत, अनु० २४ । ७)

'जो नराधम मन में भी गायों को दुःख देने की इच्छा कर लेता है, उसे चौदह इन्द्रों के काल तक नरक में रहना पड़ता है। '
—(पद्मपुराण, पाताल० १९ । ३४ )

'राजन्! जो मनुष्य जान-बूझकर भगवान्‌ की निन्दा करता है और गायों को दुःख देता है, उसका नरक से कभी छुटकारा नहीं हो सकता।'
—(पद्मपुराण, पाताल० १९ । ३६ )

'गौ की हत्या करने वाले, उसका मांस खाने वाले तथा गोहत्या का अनुमोदन करने वाले लोग गौ शरीर में जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षों तक नरक में डूबे रहते हैं।
(महाभारत, अनु० ७४ । ४)

'गोभक्त मनुष्य जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त होती है। स्त्रियों में भी जो गौओं की भक्त हैं, वे मनोवाञ्छित कामनाएँ प्राप्त कर लेती हैं । पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्या । धन चाहने वाले को धन और धर्म चाहने वाले को धर्म प्राप्त होता है । विद्यार्थी विद्या पाता है और सुखार्थी सुख । भारत ! गोभक्त के लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं है ।'
—(महाभारत, अनु० ८३ । ५०-५२ )

'जो गौओं को प्रतिदिन जल और तृण सहित भोजन प्रदान करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है।'
—(बृहत्पराशरस्मृति ५। २६-२७ )

विशेष—
वास्तव में कुत्ते-बिल्ली आदि का घर से बाहर पालन करना, उनकी रक्षा करना दोष नहीं है, प्रत्युत में प्राणिमात्र का पालन-पोषण करना मनुष्य का विशेष कर्तव्य है । (यदि वह कुत्ते-बिल्ली मनुष्यों तथा किसी निर्दोष जीवन को हानि न पहुंचा रहे हों तब) ।
परन्तु कुत्ते-बिल्ली आदि के साथ घुल-मिलकर रहना, उनको साथ में रखना, उनका स्पर्श करना, उनमें आसक्ति करना, उनसे अपनी जीविका चलाना आदि यह सब महापाप हैं ।

"शिवार्पणमस्तु"
-ASTROLOGER MANU BHARGAVA 

शुक्रवार, 23 मई 2025

उदर (Stomach) रोग वाली जन्मकुंडली का विश्लेषण व उपाय


 यह लगभग साढ़े चार वर्ष की एक छोटी बच्ची की जन्मकुंडली है । जिसका जन्म १० अक्टूबर २०२० को प्रातः ११ बजकर ३० मिनट पर गाजियाबाद जिले में हुआ है ।

अपनी बाल्यावस्था से ही इस बच्ची को पेट में कुछ न कुछ समस्याएं लगी रहती थीं और अभी गोचर में कुछ समय पूर्व बने पिशाच योग (राहु-शनि युति) में इस बच्ची को Appendicitis डिटेक्ट होकर Rupture हो गया (अपेंडिक्स फट जाना) । इसके पश्चात् इस बच्ची के परिवारजन इसे एक अच्छे हॉस्पिटल में लेकर गए जहां इसका फूड पाइप ब्लॉक हो गया और पेट भी फूल गया, तब यह जन्मकुण्डली मेरे पास आई । ईश्वर की कृपा से आज यह बच्ची सुरक्षित है ।

ऐसे क्या ज्योतिषीय कारण रहे होंगे जो इस छोटी बच्ची के साथ ऐसी घटना घटित हुई और ऐसी जन्मकुंडलियों में कौन से ज्योतिषीय उपचार करवाए जा सकते हैं ? आइए जानते हैं—

इस बच्ची की जन्मकुंडली का पंचम भाव (पेट का स्थान) षष्ठेश (रोगेश) मंगल के पाप प्रभाव में है जो कि वक्री भी है अर्थात् छठे भाव के अपने क्रूर फलों में भी लगभग तीन गुना वृद्धि कर चुका है ।

इसके अतिरिक्त यही मंगल, केतु अधिष्ठित राशि का स्वामी भी है अर्थात् इस मंगल की क्रूरता के पीछे स्वयं मंगल की छाया लिए हुए केतु की नकारात्मक ऊर्जा भी कार्य कर रही है ।  (१- फलित ज्योतिष में एक बहुत बड़ा सिद्धांत यह है कि किसी भी ग्रह की राशि पर यदि कोई दूसरा ग्रह भी स्थित हो तो वह पहला वाला ग्रह अपने शुभाशुभ फलों के साथ-साथ उस दूसरे ग्रह के भी फलों को भी देने लगता है, जो ग्रह उसकी राशि पर बैठा होता है )
२- राहु-केतु जिस भी ग्रह के साथ, जिस भी ग्रह की राशि में बैठते हैं, उसकी छाया ग्रहण कर लेते हैं और क्रमशः शनि-मंगल जैसे अपने पृथकतावादी प्रभावों के अतिरिक्त उस ग्रह के प्रभावों को भी देने लगते हैं ।) 

केवल इतना ही नहीं, मंगल की छाया लिए हुए यही केतु अपनी पंचम पाप दृष्टि से पंचम भाव को भी देख रहा है और इस पंचम भाव पर वर्गोत्तम शनि की तृतीय पाप दृष्टि भी है तथा पंचमेश बृहस्पति, शनि-केतु के पाप कर्तरी योग में घिरा हुआ है और पेट का कारक सूर्य, राहु की पंचम दृष्टि तथा रोगेश मंगल की सप्तम दृष्टि से ग्रसित है ।

यद्यपि यहां मंगल इस बच्ची का लग्नेश भी है तथापि उसकी मूल त्रिकोण राशि 'मेष' छठे भाव में स्थित होने से वह अपनी मूल त्रिकोण राशि का ही फल अधिक दे रहा है । अतः इस बच्ची का पंचम भाव (पेट का भाव), पंचमेश बृहस्पति (भावाधिपति) तथा पेट का कारक सूर्य—यह तीनों ही पीड़ित हैं ।

यदि भावात् भावम् सिद्धांत के अनुसार भी देखें तो पंचम से पंचम अर्थात् नवम भाव का अधिपति चंद्रमा भी अपने से द्वादश अर्थात् अष्टम् भाव (अशुभ स्थान) में स्थित है । जो कि रोगेश मंगल की चतुर्थ दृष्टि से तथा मंगल अधिष्ठित राशि के स्वामी बृहस्पति से दृष्ट है ।

एक तो इतने सारे कारण ही पर्याप्त थे इस बच्ची को बाल्यावस्था से ही पेट की इतनी गंभीर समस्या देने के लिए,  ऊपर से अभी गोचर में मीन राशि में लगभग ५० दिन के लिए बना पिशाच योग (शनि-राहु युति) जो कि १८ मई तक चला, वह भी इस बच्ची के पेट के स्थान पंचम भाव पर ही बन गया । इस बच्ची के लग्न पर गोचर लगाने पर मीन राशि इसके पंचम भाव में स्थित है, जहां १८ मई तक राहु-शनि ने संचार किया है तथा गोचर में भी भावात् भावम् सिद्धांत लगाने पर पंचम से पंचम अर्थात् नवम भाव पर षष्ठेश ( रोगेश) होकर नीच का मंगल संचार कर रहा है ।

इस सम्बन्ध में जानने के लिए मेरा पूर्व का ब्लॉग देखें—

यदि बात करें इस कुंडली में चल रही दशा-अंतर्दशा की तो वर्तमान समय में इसकी बृहस्पति की महादशा (पाप कर्तरी योग से पीड़ित पंचमेश की दशा) में चंद्रमा (अष्टम में गए हुए नवमेश) की अंतर्दशा में पेट के कारक सूर्य पर दृष्टि डालने वाले राहु (अकस्मात चिकित्सालय लेकर जाने वाला कारक ग्रह) की प्रत्यंतर दशा चल रही है ।


ऐसे में अत्यन्त अशुभ गोचर तथा अशुभ दशाओं के इस मेल ने इस बच्ची को गंभीर स्थिति में हॉस्पिटल तक पहुंचा दिया । मेरे पास जब यह जन्मकुंडली आई थी, तब तक इस बच्ची के जीवन को बचाने वाले चिकित्सकों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए थे किन्तु ईश्वर द्वारा हमें दिए गए ज्योतिष के वरदान और उनके आशीर्वाद से यह बच्ची अभी जीवित है ।

आइए बात करते हैं अब उन ज्योतिषीय उपायों की जिससे इस बच्ची के प्राणों की रक्षा हुई

सर्वप्रथम मंगल ग्रह के क्रूर प्रभावों को नष्ट करने के लिए तत्काल ही इस बच्ची के लिए ११ वेदपाठी ब्राह्मणों से ११ सुंदरकांड पाठ करवाए गए । इसके साथ ही दूसरे वेदपाठी ब्राह्मणों की टीम से इस बच्ची के मंगल, राहु, केतु जैसे पृथकतावादी ग्रहों की विधिवत् शांतियां करवाईं गईं और पंचम भाव (पेट के स्थान) के स्वामी ग्रह बृहस्पति का रत्न 'पुखराज' (बृहस्पति लग्नेश के मित्र होने तथा स्वराशि में स्थित होने से यहां द्वितीयेश होने पर भी मारक नहीं बनेंगे) तथा पेट के कारक ग्रह सूर्य का रत्न 'माणिक' इस बच्ची के गले में पेंडेंट में (रत्न उनकी उंगलियों में ही अपने पूर्ण फलों को देते हैं) धारण करवाया गया, जिससे भाव अधिपति बृहस्पति तथा कारक सूर्य दोनों ही को शक्ति प्राप्त हो सके ।

मेरे द्वारा ब्लॉग लिखे जाने तक यह बच्ची लगभग ८० प्रतिशत तक स्वस्थ हो चुकी है, इसके पूर्णतः स्वस्थ होने पर इसके लिए एक बार पुनः इन्हीं अशुभ ग्रहों की शांतियों के साथ एक महामृत्युंजय अनुष्ठान भी करवाया जाएगा, जिससे इस बच्ची को आगे इस प्रकार की कोई भी समस्या न आने पाए और यह निरोगी रहकर दीर्घायु प्राप्त कर सके क्योंकि आज जो समस्या इसके पेट में आई है, ठीक वैसी ही समस्या इसके हृदय (हार्ट) में भी आएगी, जिसका कारण यह है कि पंचम भाव केवल पेट का ही नहीं हार्ट का स्थान भी होता है तथा सूर्य केवल पेट का ही नहीं, हार्ट का भी निर्माण करता है ।
इस विषय को और अधिक सरलता से समझने के लिए चिकित्सा ज्योतिष पर आधारित मेरा यह ब्लॉग पढ़ें—

आगे चलकर इस बच्ची को हार्ट की भी समस्या आएगी, यह बात मैंने इसके परिवार में से अभी तक किसी को भी नहीं बताई है क्योंकि वह सभी पहले से ही इतना कष्ट प्राप्त करके चुके हैं, ऐसे में मैं उनको और अधिक व्यथित नहीं करना चाहता ।

आप सभी को यह जानकर बहुत प्रसन्नता होगी कि जो ज्योतिषीय उपाय इस बच्ची के पेट के लिए करवाए गए हैं, वही इसको जीवन में या तो कभी हार्ट की गंभीर समस्या उत्पन्न ही नहीं होने देंगे अथवा उस समस्या को बहुत कम कर देंगे क्योंकि जिन ग्रहों की शांतियां करवाई गई हैं, अब वह केवल पेट ही नहीं, हार्ट को भी हानि नहीं पहुंचा सकेंगे तथा जिन ग्रहों के रत्न धारण करवाए गए हैं वह इस बच्ची के पेट के साथ-साथ इसके हार्ट को भी बल प्रदान करेंगे और इस प्रकार यह छोटी बच्ची तथा इसका परिवार कभी यह जान नहीं सकेगा कि और बड़े दुःख उनके जीवन में आ सकते थे जो कि नहीं आए ।


नोट— १—इस बच्ची को आजीवन नीले, लाल तथा गहरे स्लेटी रंगों को स्वयं से दूर रखना होगा तथा गहरे पीले रंगों का प्रयोग जीवन में बढ़ाना होगा ।

२— आयु में कुछ बड़ी होने पर इस बच्ची को यही दोनों रत्नों को पेंडेंट से निकलवाकर अपने बाये हाथ की उंगलियों में धारण करने होंगे । पुखराज (तर्जनी), माणिक (अनामिका), (स्त्रियों को बाएं हाथ तथा पुरुषों को दाहिने हाथ में रत्न धारण करने से अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं ।)

३—जीवन भर राहु, केतु तथा मंगल के दान करते रहने होंगे जिससे उनके पाप प्रभावों में और भी अधिक कमी आ सके तथा पीले रंग की वस्तुओं का कभी भी दान नहीं करना होगा अन्यथा बृहस्पति के बल में भी कमी आ जाएगी जबकि इसे अपने बृहस्पति को सदा बलवान रखना है । (पंचमेश होने के कारण)

४—भगवान् विष्णु इसके इष्टदेव हैं, कुछ बड़ी होने पर किसी योग्य विद्वान ब्राह्मण से इस बच्ची को इसके अधिकार की सीमा में आने वाले भगवान् नारायण (श्री हरि विष्णु, श्री राम, श्री कृष्ण) के मंत्र की दीक्षा लेकर उनके मंत्रों के जप करने चाहिए, जिससे इसके इष्टदेव की कृपा भी इस पर बनी रहेगी ।


इस ब्लॉग को लिखने के पीछे का मेरा उद्देश्य १ प्रतिशत भी प्रशंसा प्राप्त करना नहीं है । लोकेष्णा (अपने ही जैसे नाशवान प्राणियों से सम्मान प्राप्त करने की तृष्णा) से मैं जितनी घृणा करता हूँ शायद ही कोई दूसरा करता होगा ।
इस विषय पर पढ़ें मेरा ब्लॉग—

मेरा तो इस ब्लॉग को लिखने का उद्देश्य केवल यही है कि ईश्वर की कृपा से जो विद्या मुझे प्राप्त हुई है, वह मेरी मृत्यु के उपरांत कहीं मेरे साथ ही नष्ट न हो जाए तथा हो सकता है कि मेरे न रहने के पश्चात् भी मेरा यह ब्लॉग ऐसे ही कितने जातकों का जीवन बचाने में सहायक सिद्ध हो जाए । यदि ऐसा होता है तो ईश्वर अपने जिन कार्यों को करवाने के लिए हमें ज्योतिष विद्या का यह ज्ञान देकर इस संसार में भेजते हैं, उनके उन कार्यों को करके मैं परम् शांति के साथ उनके श्री चरणों में विलीन हो सकूंगा ।

"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava

गुरुवार, 6 मार्च 2025

पिशाच योग (शनि-राहु युति २०२५)


शीघ्र ही गोचर में एक बहुत बड़ा दुर्योग बनने जा रहा है जिसके विषय में मैं बहुत समय पूर्व से संकेत करता आ रहा हूँ , ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसका नाम है—'पिशाच योग'।

२९ मार्च को शनि द्वारा राशि परिवर्तन कर लेने के साथ ही गोचर के अन्तर्गत 'मीन राशि' में शनि-राहु की युति बन जायेगी जो कि १७ मई तक रहेगी, १८ मई को राहु-केतु द्वारा राशि परिवर्तन करने के उपरान्त ही शनि-राहु की यह युति भंग हो सकेगी । ब्रह्माण्ड में होने जा रही अत्यन्त दुर्लभ यह घटना पिशाच योग को जन्म देगी ।

शनि-राहु जैसे दो पापी ग्रहों की युति किसी भी अवस्था में शुभ नहीं कही जा सकती । अपने जीवनकाल में अब तक मैंने जितनी भी जन्म-कुंडलियों में शनि-राहु की युति पाई है, उनमें उस जातक के लिए मैंने विशेष विध्वंसात्मक तत्वों की अधिकता ही देखी है, जिनका उल्लेख करके मैं इस ब्लॉग को पढ़ने वाले जनमानस के हृदयों में भय उत्पन्न नहीं करना चाहता ।

यद्यपि गोचर में दो अत्यन्त पृथकतावादी पाप ग्रहों की होने जा रही यह युति अनेक दुर्योगों को जन्म देने वाली सिद्ध होगी तथापि राहु द्वारा १६ मार्च को शनि के नक्षत्र (उत्तराभाद्रपद) से निकलकर, बृहस्पति के नक्षत्र (पूर्वाभाद्रपद) में संचार करने के कारण राहु के स्वभाव में ज्ञान तथा अध्यात्मिक भावना आ जाएगी, जिसके कारण वह धार्मिक जातकों की उतनी हानि नहीं कर सकेंगे जितनी कि शनि के साथ होने वाली इस युति के कारण कर सकते थे ।

यह सत्य है कि गोचर में शनि-राहु की युति होना कभी भी एक उत्तम योग नहीं होता किन्तु इस योग के बनने के समय राहु द्वारा बृहस्पति के नक्षत्र में संचार करने से यह समय तंत्र साधना के लिए अत्यन्त शुभ हो जाएगा ।

राहु गूढ़ रहस्यों-रहस्यमयी विद्याओं, शनि वैराग्य तथा बृहस्पति ज्ञान व अध्यात्म के कारक ग्रह होते हैं । ऐसे में राहु द्वारा बृहस्पति की राशि तथा बृहस्पति के ही नक्षत्र में शनि के साथ युति को प्राप्त हो जाने के कारण साधकों को ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति की सहायता से रहस्यमयी सिद्धियां प्राप्त करने के लिए नई ऊर्जा प्राप्त होगी, जिसके कारण तन्त्र साधनाओं के लिए यह समयकाल अत्यन्त विलक्षण हो जाएगा । इस समय साधकों की सुषुम्ना नाड़ी भी अधिक समय तक जाग्रत रहेगी, जिसके कारण उन्हें सिद्धियां प्राप्त करने में अधिक समय नहीं लगेगा ।

यदि इस युति के परिणाम से उत्पन्न दुर्योगों की बात करें तो—सभी जातकों की जन्मकुंडली में शनि जिन-जिन भावों के स्वामी और कारक होंगे, उनसे सम्बन्धित पदार्थों को राहु हानि पहुंचाएंगे तथा शनि की छाया लिए हुए राहु जहां-जहां दृष्टि डालेंगे, वहां-वहां वह दृष्टियां भी विशेष अनिष्टकारी हो जायेंगी (शनि की छाया ग्रहण कर लेने के प्रभाव से) ।

अतः बुद्धिमान मनुष्यों को इस अवधिकाल में राहु के निमित्त जो दान शास्त्रों में बताए गए हैं, शनिवार के दिन (शनि की होरा में ) उन दानों को करना चाहिए तथा नील वर्ण के वस्त्रों को धारण करने से, तम्बाकू से बने उत्पादों का सेवन करने से व अधिक पुरानी काष्ठ को अपने समीप रखने से बचना चाहिए ।

राहु, भगवती दुर्गा के परम् भक्त होते हैं इसलिए स्मार्त्त अथवा शाक्त परम्परा से दीक्षित योग्य ब्राह्मण गुरु द्वारा प्राप्त भगवती के मंत्र' का जप करने से राहु अपने नकारात्मक प्रभाव को समाप्त कर देते हैं ।

इसके अतिरिक्त जो जातक अदीक्षित हैं वह बिना प्रणव (ॐ) का उच्चारण किए देवी के विभिन्न स्त्रोतों का पाठ कर सकते हैं ।

जो जातक किसी कारणवश यह भी नहीं कर सकते वह किसी 'जाग्रत देवालय' में जाकर भगवती को नारियल व श्रृंगार की वस्तुएं भेंट करके उनसे अपने कल्याण की प्रार्थना कर सकते हैं ।

गोचर में लगभग ५० दिन के लिए बनने जा रहे शनि-राहु योग के इस अवधिकाल में भगवती की योगिनी शक्ति, शनि-राहु की सहायता से विश्व भर में भूकंप, सुनामी, चक्रवात लाकर अनेक प्राणियों को विदीर्ण करेगी । अतः लगभग ५० दिनों का यह समयकाल मौसम वैज्ञानिकों के लिए बहुत चुनौतियों से भरा हुआ रहने वाला है । इसके अतिरिक्त मार्च के महीने में पड़ने वाले चंद्रग्रहण व सूर्यग्रहण, भचक्र में एक नवीन प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का निर्माण कर देंगे, जिसके कारण यह ५० दिन विश्व भर में प्राकृतिक आपदाओं तथा दुर्घटनाओं के लिए और भी अधिक घातक हो जाएंगे ।

इधर नीच राशि में स्थित मंगल भी दुर्घटनाओं तथा अग्निकांडों की ओर संकेत कर रहा है ।  १४ मार्च को पड़ने जा रहे चंद्रग्रहण के एक दिन पूर्व से ही विश्वभर के भूगर्भ वैज्ञानिकों के लिए चुनौतियां आरम्भ हो जायेंगी, जिनका निर्वाहन करने का समय भी उनको प्राप्त न हो सकेगा । विद्वान मनुष्यों को बड़े भूकंपों से सावधान रहने की आवश्यकता है ।

यदि और अधिक सरल शब्दों में कहूं तो शनि-राहु की युति के इस अवधिकाल को ईश्वर की शरण में रहकर शान्ति के साथ निकालने की आवश्यकता है क्योंकि मीन राशि में होने जा रही इस युति के कारण अब तक वहां संचार कर रहे उच्च के शुक्र भी अपनी शुभता को खो देंगे तथा वह विभिन्न जातकों के जिस-जिस भाव के स्वामी व कारक होंगे वहां से सम्बन्धित पदार्थों की हानि करने लगेंगे ।

नोट— 

[ ] शनि के राशि परिवर्तन कर लेने के साथ ही कुछ जातकों की ढैया-साढ़े साती समाप्त, तो कुछ की आरम्भ होगी किन्तु यह इस ब्लॉग का विषय न होने से इस विषय में यहां जानकारी नहीं दे रहा हूँ । यदि संभव हुआ तो उसके लिए अलग से एक ब्लॉग लिख दूंगा । 


[ ] ज्योतिष शास्त्र में श्रद्धा रखने वाले विद्वान मनुष्यों को २९ मार्च से लेकर १८ मई तक अपने बच्चों की डिलीवरी करवाने से बचना चाहिए । यदि संभव हो सके तो २९ मार्च से पूर्व (शनि-राहु युति बनने से पूर्व) अथवा ६ जून के पश्चात् (मंगल के नीच राशि में संचार करने के कारण) ही बच्चों की डिलीवरी हो अन्यथा उनकी जन्म-कुंडली में जीवनभर के लिए शनि-राहु की युति तथा नीच राशि के मंगल की स्थिति बन जाएगी, जो कि बहुत कष्टकारी सिद्ध होगी । 

"शिवार्पणमस्तु"

—Astrologer Manu Bhargava

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

सनातन धर्म की आन्तरिक चुनौतियां भाग—३

भाग १ तथा २ देखने के लिए इन लिंक्स पर जाएं—

९ अक्टूबर को देव गुरु बृहस्पति 'वृष राशि' में, 'मृगशिरा नक्षत्र के द्वितीय चरण' में वक्री होने जा रहे है, जिसका शुभाशुभ प्रभाव सभी राशि-लग्न वाले जातकों पर पड़ने वाला है । इधर 'शनि' पहले से ही वक्री चल रहे हैं जो कि १५ नवम्बर को मार्गी होंगे ।

गोचर में संचार कर रहे ग्रहों की परिवर्तित होती स्थितियों के कारण ही हमारे जीवन में भी प्रत्येक क्षण परिवर्तन आते रहते हैं (यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे) । अतः ये मान-सम्मान , हानि-लाभ, सुख-दुःख, जय-पराजय और जीवन-मृत्यु सब कुछ परिवर्तनशील है, इनमें से कुछ भी स्थिर नहीं है । इसलिए विद्वान मनुष्यों को इनमें से किसी से भी मोहित नहीं होना चाहिए और निरन्तर अपने इष्टदेव के मंत्रों का जप करते हुए सदा उन्हीं की शरण में रहना चाहिए ।

ईश्वर द्वारा ज्योतिष शास्त्र के निर्माण का कारण ही यह था कि मनुष्य अपनी जन्मकुंडली तथा गोचर में संचार कर रहे ग्रहों की स्थितियों को देखकर, उनके द्वारा स्वयं पर पड़ने वाले शुभाशुभ परिणामों का अवलोकन करके, मंत्र-यज्ञ-दान-रत्न आदि चिकित्साओं द्वारा अपना उपचार करते हुए, सुखी जीवन व्यतीत कर सके और सरलता से मोक्ष तक की अपनी यात्रा संपन्न कर सके । यही कारण है कि ज्योतिष को ईश्वर का दिखाया हुआ प्रकाश (ज्योति+ईश) कहते हैं ।


वर्तमान काल की भांति, प्राचीन काल में ज्योतिष शास्त्र केवल भाग्य बताने अथवा मुहूर्त आदि निकालने तक ही सीमित नहीं था । प्राचीन काल में ज्योतिषीय गणना के आधार पर राजाओं के यहां नियुक्त विद्वान राजज्योतिषी उन्हें उनके राज्य में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं की सूचना पहले से ही दे दिया करते थे, जिससे प्रजा तथा उस राज्य की सुरक्षा की जा सके । ऐसी ही कितनी ही भविष्यवाणियां तो स्वयं मैं ही वर्षों से करता हुआ आ रहा हूँ, जो कि पूर्णतः सत्य घटित हुई हैं । जो लोग मुझे वर्षों से जानते हैं , वह इस बात के साक्षी हैं ।

स्वयं व्यास जी ने महाभारत युद्ध होने से पूर्व 'भारतवर्ष' (सम्पूर्ण आर्यवर्त) में पड़ने वाले सूर्य-चंद्र ग्रहण तथा गोचर में ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति देखकर, राजा धृतराष्ट्र को महाभारत के युद्ध में होने वाले महाविनाश की चेतावनी पहले ही दे दी थी, जिसका विवरण हमें महाभारत ग्रंथ में प्राप्त होता है । ऐसे में जब आज हम देखते हैं कि मलेच्छ प्रवृत्ति के धर्मद्रोही तत्वों के साथ-साथ कुछ अशास्त्रीय कथावाचक (सभी नहीं) भी ज्योतिष शास्त्र की निंदा करने में लगे हुए हैं तो इसके मूल में और कुछ नहीं कलियुग का प्रभाव ही है ।


वैदिक परम्परा प्राप्त कथावाचकों की आड़ लेकर, उनकी पीठ पीछे छुपकर, स्वयं ही मंत्र दीक्षा लेने-देने, यज्ञ करने-करवाने तथा व्यासपीठ पर बैठकर कथा कहने के लिए अनधिकृत होते हुए भी, अपने कल्ट में ब्राह्मणों से लेकर मलेच्छों तक को मंत्र दीक्षा दे रहे ऐसे अनेक 'वर्णेतर' तत्व हमें यह बताने का कष्ट करेंगे कि बिना शुभ मुहूर्त के क्या वह कोई कथा-व्यास पूजन-यज्ञ आदि करवा सकते हैं ? यदि हां तो कैसे और यदि नहीं तो ये मुहूर्त इन्हें कौन बताएगा ?
इसका उत्तर है—ज्योतिष शास्त्र ।

वास्तव में ज्योतिष शास्त्र वेद के ६ अंग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छंद, निरुक्त) जिन्हें वेदांग कहा जाता है, में से एक है और यह वेदांग में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखता है कि इसे वेद के नेत्र का स्थान प्राप्त है । महर्षि पाणिनि ने भी ज्योतिष शास्त्र को वेदपुरुष का नेत्र कहा है तथा जितने प्राचीन वेद हैं, उतना ही प्राचीन ज्योतिष शास्त्र भी है ।

जिन महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा लिखे गए पुराणों की कथा सुनाकर ये अशास्त्रीय-अनाधिकृत कथावाचक और कल्ट गुरु अपने यजमानों से मान-सम्मान तथा धन आदि प्राप्त करते हैं, उन्हीं महर्षि वेदव्यास जी के पिता महर्षि पराशर जी, ज्योतिष शास्त्र (वैदिक ज्योतिष) के एक महान ज्ञाता थे, जिनके द्वारा लिखित ग्रंथ 'बृहत् पराशर होरा शास्त्र' में वर्णित ज्योतिष के गूढ़ सिद्धांतों का अनुसरण करके ही अधिकांश ज्योतिषाचार्य, सभी जातकों को उनका भविष्यफल बताया करते हैं ।

अब बात करते हैं कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वह कौन से ग्रह तथा भाव-भावेश होते हैं जिनके कारण कोई व्यक्ति व्यासपीठ पर बैठकर, अपनी कथाओं के माध्यम से हजारों-लाखों श्रोताओं को ज्ञान देकर उनका जीवन बदलने में सक्षम हो पाता है ? 
इसका उत्तर है— जन्मकुंडली के द्वितीय भाव-द्वितीयेश (वाणी स्थान और उसका स्वामी ग्रह) तथा नवम भाव-नवमेश (धर्म स्थान और उसका स्वामी ग्रह) पर पड़ने वाले शुभ ग्रहों का प्रभाव तथा वाणी के कारक बुध और ज्ञान के कारक बृहस्पति का उसकी जन्मकुंडली में शुभ स्थिति में बैठना ।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किसी भी मनुष्य की वाणी तथा लेखन का कारक बुध होता है और ज्ञान तथा आध्यात्मिकता का कारक बृहस्पति । ऐसे में कोई भी ऐसा धर्मगुरु जो कि अच्छा वक्ता-लेखक-ज्ञानी तीनों हो, तो इसका कारण उसकी जन्मकुंडली में बुध तथा बृहस्पति की स्थिति का अत्यन्त शुभ होना होता है । ऐसे में यदि उसके द्वितीय भाव-द्वितीयेश, नवम भाव-नवमेश पर भी शुभ ग्रहों का प्रभाव हो, तो वह एक अच्छा कथावाचक-धार्मिक वक्ता बनकर देश-विदेश में ख्याति प्राप्त करता है किन्तु वर्णेतर होने अथवा राहु के पाप प्रभाव के कारण अनेक बार ऐसा व्यक्ति किसी नए 'कल्ट' के निर्माण का भी कारण बन जाता है । उसकी जन्मकुंडली में इन ग्रहों की स्थिति भी विशाल जनसमुदाय को अपनी ओर आकर्षित करने में उसकी पूरी सहायता करती है, यही कारण है कि विश्व भर में बहुत से ऐसे कल्ट बनते आए हैं और बनते रहेंगे जिनके धर्मगुरुओं (जो वास्तव में अधर्म गुरु होते हैं) ने अपनी जन्मकुंडलियों में बने हुए ऐसे योगों का दुरुपयोग करके विशाल जनसमुदाय को मूर्ख बनाने का कार्य किया । ऐसे अनेक कल्ट गुरुओं के ग्रहों का प्रभाव तो ऐसा है कि उनकी मृत्यु के सैंकड़ों वर्ष व्यतीत होने के पश्चात् भी आज तक लोग उनकी लिखी हुई पुस्तकें (कुछ किताबें भी) लाकर पढ़ते हैं और उनके कल्ट को आगे बढ़ा रहे हैं ।

किसी भी जातक की जन्मकुंडली का द्वितीय भाव जो कि धन का भी भाव होता है, द्वितीयेश (धनेश) धनभाव का स्वामी ग्रह होता है तथा धन का कारक देव गुरु बृहस्पति होता है । ऐसे में उस अशास्त्रीय धर्मगुरु-कथावाचक-कल्ट गुरु की जन्मकुंडली में इन पर पड़ने वाले शुभ प्रभाव के कारण उसको अपने जीवन में कभी धन की भी कोई कमी नहीं रहती । अतः इससे यह सिद्ध होता है कि ज्योतिष शास्त्र की निंदा करने वाले कल्ट गुरु एवं अशास्त्रीय कथावाचक भी स्वयं ग्रहों के ही आधीन होते हैं ।

यदि ये सारे ज्योतिषीय सूत्र छोड़ भी दिए जाएं (क्योंकि ज्योतिष के ज्ञान के बिना इनको यह सूत्र समझ में नहीं आएंगे), तो भी मैं अपने ज्ञान की वृद्धि के लिए भगवान् श्रीराम-कृष्ण आदि के नाम से अपनी दुकान चलाने वाले इन सभी महानुभावों से आज यह समझना चाहता हूँ कि वह कौन से ऋषि थे जिन्होंने भगवान् श्री राम चंद्र की जन्मकुंडली देखकर उनके जीवन में प्राप्त होने वाले दुःखों की भविष्यवाणी कर दी थी और क्या महर्षि गर्ग ने भगवान् श्री कृष्ण की जन्मकुंडली देखकर उनका नामकरण संस्कार नहीं किया था ? 

वास्तव में सत्यता यह है कि आज जितने भी परम्परा प्राप्त प्रामाणिक धर्माचार्य अथवा कथावाचक हैं, वह सभी ज्योतिष शास्त्र का महत्व जानते हैं और ज्योतिष शास्त्र को बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं । वह जानते हैं कि ज्योतिष की निंदा अर्थात् वेद की निंदा है (वेदांग होने के कारण) और किसी वेद निंदक को कथावाचक या धर्माचार्य कहना तो दूर की बात है, वह तो हिंदू कहलाने के योग्य भी नहीं होता क्योंकि—
वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्यय: ।
अर्थात्— वेदों में विहित बताए गये कर्मो को करना धर्म है और उसके विपरीत (वेदों में निषिद्ध) कार्यों को करना अधर्म है।

ऐसे वह नकली कथावाचक और कल्ट गुरु, जो वर्णेतर और धर्मेतर होने के कारण व्यासपीठ पर बैठने के लिए अधिकृत भी नहीं हैं (जिनमें से अधिकांश तो उस कल्ट के ही अनुयायी है, जिन्होंने अनधिकृत होते हुए भी आजकल भगवान् श्री कृष्ण के नाम पर देश-विदेश में धर्म की दुकान लगाई हुई है), उनसे मुझे यही कहना है कि—

यो नरः शास्त्रमज्ञात्वा ज्यौतिषं खलु निन्दति ।
रौरवं नरकं भुक्त्वा चान्धत्वं चान्यजन्मनि ।।
अर्थात् —
जो मानव ज्योतिष शास्त्र को अच्छी प्रकार न समझकर उसकी निंदा करता है, वह रौरव नामक नरक में वास करके अन्धा होकर जन्म ग्रहण करता है।।
(बृहतपाराशर होरा शास्त्रम्)

"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava

बुधवार, 2 अक्टूबर 2024

लग्न और लग्नेश

किसी भी जातक की जन्म-कुण्डली में 'लग्न' से हम उसका स्वास्थ्य, उसकी आयु , उसके शरीर की बनावट तथा उसको जीवन में मिलने वाला मान-सम्मान आदि देखते हैं । जीवन की यात्रा ही लग्न से आरंभ होती है, जो कि १२वें भाव (व्यय स्थान) पर जाकर समाप्त हो जाती है । लग्न के स्वामी ग्रह को 'लग्नेश' कहते हैं, जो कि किसी भी जातक की जन्मकुंडली में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है ।

लग्नेश जन्मकुंडली के १२भावों में जहां भी स्थित हो जाता है, हमें उसी भाव से सम्बन्धित पदार्थों में आसक्ति उत्पन्न करवा देता है क्योंकि लग्नेश और कोई नहीं हम स्वयं होते हैं । ऐसे में जहां-जहां हमारा लग्नेश जाता है हम भी उन्हीं-उन्हीं स्थानों पर अपनी आसक्ति करने में विवश होते हैं ।

लग्न-लग्नेश पर शुभ प्रभाव हो, लग्नेश केंद्र-त्रिकोण में बैठा हो तथा नीच का न हुआ हो, तो ऐसा जातक अच्छी आयु, स्वास्थ्य और मान-सम्मान का सुख प्राप्त करता है किन्तु इसके विपरीत लग्न-लग्नेश पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो, लग्नेश ६, ८, १२ वें भाव में हो, अपनी नीच राशि में स्थित हो या अस्त हो जाए तो ऐसे में उस जातक को संसार में अनेक प्रकार के कष्ट और अपयश भोगने पड़ते हैं ।

लग्न तथा लग्नेश के विषय में एक महत्वपूर्ण बात और भी है, वह ये कि अधिकांश ज्योतिषाचार्य गोचर के जो नियम 'चंद्र कुंडली' पर लगाते हैं, यदि वही नियम वह 'लग्न कुंडली तथा लग्नेश' पर भी लगाएं तो उन्हें कहीं अधिक सटीक फलादेश प्राप्त होंगे ।

यह तो हुई थोड़ी सी जानकारी लग्न तथा लग्नेश के विषय में, अब हम बात करते हैं लग्नेश के लग्न में ही स्थित होने अथवा लग्न को देखने के फलों की ।

किसी जातक की जन्मकुंडली में लग्नेश द्वारा लग्न में ही बैठे होने अथवा लग्नेश द्वारा लग्न को देखने के जहां उस जातक को अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं, वहीं एक बहुत बड़ी हानि भी प्राप्त होती है ।

कभी-कभी ऐसा जातक अपने जीवनकाल में प्राप्त होने वाले मान-सम्मान तथा सरलता से उपलब्ध होने वाली सफलताओं से इतना आत्ममुग्ध हो जाता है कि उसको धर्म-अधर्म का कुछ बोध ही नहीं रहता ।

जीवन पर्यन्त वह सभी से अपनी प्रशंसा सुनने के लिए आतुर रहता है और जहां उसे अपनी प्रशंसा करते लोग नहीं मिलते, वहां से भागकर वह अपने लिए ऐसे नए चेले-चपाटे खोजने लगता है, जो नित्य-प्रतिदिन उसके यश का गुणगान करें । कहने का तात्पर्य यह है कि उसको उसकी चापलूसी करने वाले मनुष्यों की लत लग जाती है ।

यदि यह लग्नेश बृहस्पति हो तो समस्या और भी बड़ी हो जाती है, क्योंकि जातक की जन्म कुंडली में शुभ स्थिति में बैठा बृहस्पति ही उसको ज्ञानी तथा धनवान बनाने का कार्य करता है, ऐसे में वह बृहस्पति यदि लग्नेश होकर लग्न में ही बैठ जाए अथवा लग्नेश होकर लग्न को देख ले, तो वह उस जातक को ज्ञान के अहंकार में इतना चूर कर देता है कि  अपने अहंकार के समक्ष वह किसी को भी कुछ नहीं समझता । ऐसे में शनि और राहु की दशा-अंतर्दशाएं ही उस जातक के अहंकार को नष्ट करने का कार्य करती हैं ।

यदि वह अहंकार राहु के द्वारा नष्ट किया गया है तो उसका परिणाम बहुत ही विनाशकारी होता है किन्तु यदि वह अहंकार शनि के द्वारा नष्ट किया गया है तो आरंभ का समय तो उस जातक के लिए बहुत कष्टकारी होता है परन्तु घोर दुखों के फेर में डालकर अंत में शनि, उस जातक की मलिन आत्मा को शुद्ध करने का ही कार्य करता है ।

इसी प्रकार यदि किसी जातक की कुंडली में सूर्य लग्नेश होकर लग्न में ही बैठ जाए तथा वह डिग्रीकली भी युवावस्था का हो, तो ऐसे जातक को समस्त संसार में अपार मान-सम्मान, आयु, यश-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है ।

ऐसा जातक बलपूर्वक अपने शत्रुओं को कुचलकर रख देता है । साधारण अभिचार कर्मों के द्वारा भी वह पराजित नहीं होता । वह बड़े कद-काठी का होता है और समाज में उसको बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है ।

यदि कोई तांत्रिक भी उस पर अभिचारिक प्रयोग करने का प्रयास करता है तो वह तांत्रिक भी अपने मंत्र प्रयोगों में कोई त्रुटि हो जाने से स्वयं ही मरण को प्राप्त हो जाता है ।

जब तक इसी लग्न में जन्म लेने वाला और ऐसे ही ग्रह स्थिति लेकर बैठा हुआ कोई तंत्र साधक अपनी मंत्र शक्ति से कृत्या आदि उत्पन्न नहीं करता, तब तक ऐसे जातक को मार पाना उसके लिए भी संभव नहीं होता ।

किन्तु ऐसे जातक के जीवन साथी को जीवन पर्यन्त बहुत दुःख उठाना पड़ता है तथा वह घुट-घुट कर अपना जीवन यापन करने को विवश होता है । (शक्तिशाली सूर्य की सप्तम् शत्रु दृष्टि के कारण) ।

यहां मैं एक बात सभी को बता दूं कि लग्नेश का लग्न में बैठना और अथवा लग्न को देखना एक बहुत ही उत्तम योग माना जाता है । यहां तक कि मैंने भी अपने जीवन काल में जिन बच्चों की डिलीवरी के मुहूर्त निकाले हैं, उनका भी लग्नेश, उनके लग्न में ही रखने का प्रयास किया है तथा लग्न-लग्नेश की डिग्री (अंश) भी युवावस्था की रखने की हरसंभव चेष्ठा की है ।

ऐसे में भगवान् शंकर और माता भवानी के द्वारा, मेरे माध्यम से निकलवाए गए 'चाइल्ड डिलीवरी मुहूर्त' में जन्में सभी बच्चे जीवन पर्यन्त स्वास्थ्य, आयु, मान-सम्मान तो प्राप्त करेंगे ही, इसके अतिरिक्त वह ऋण, रोग व शत्रुनाशक भी सिद्ध होंगे क्योंकि छठे भाव का अष्टम् स्थान (हानि स्थान), 'लग्न' होता है ।

इन सभी बच्चों के माता-पिताओं को यह ध्यान रखना होगा कि कहीं उनके बच्चे अपने जीवनकाल में प्राप्त होने वाली सफलताओं से इतने आत्ममुग्ध न हो जाएं कि वह धर्म और अधर्म का भेद ही भूल जाएं । इसके लिए उन माता-पिताओं का भी यह कर्तव्य है कि वह आरंभ से ही अपने इन बच्चों को उनकी देह के अभिमान से मुक्त होने की सीख दें तथा उन्हें ईश्वर भक्ति के मार्ग में लगाएं ।

लग्नेश के लग्न में बैठे होने अथवा लग्न को देखने के कारण जीवन में सरलता से जो कुछ भी उपलब्धियां हमें प्राप्त होती हैं, हमें उन्हें भगवान् का आशीर्वाद मानकर विनम्रतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए तथा सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि देहाभिमानियों का साथ तो उनके इष्टदेव भी छोड़ देते हैं ।
"शिवार्पणमस्तु"

नोट—ज्योतिष शास्त्र एक ब्रह्मविधा है जो बिना दैवीय सहायता से किसी को भी प्राप्त नहीं हो सकती । मैंने अपने इस छोटे से लेख में ज्योतिष के अनेक गुप्त सूत्र प्रकट किए हैं, ऐसे में जिस पर भगवान् की कृपा होगी, केवल वही उन सूत्रों को ग्रहण कर सकेगा ।
—Astrologer Manu Bhargava