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शनिवार, 13 दिसंबर 2025

कुपात्र के हाथों में ज्योतिष शास्त्र के जाने के दुष्परिणाम" —

बहुत समय पहले की बात है, एक व्यक्ति के दो पुत्र थे । वह उन दोनों की जन्मकुंडली लेकर एक अधकचरे ज्योतिषी के पास गया । उस अधकचरे ज्योतिषी को ज्योतिष शास्त्र का जितना ज्ञान था उसके आधार पर उसने उस व्यक्ति के उन दोनों पुत्रों की जन्मकुंडलियों का विश्लेषण करके यह भविष्यवाणी की— "तुम्हारा छोटा पुत्र ही तुम्हारी सेवा करेगा न कि ज्येष्ठ पुत्र ।"


ज्योतिषी की यह बात उस व्यक्ति ने अपने मन में गांठ की तरह बांध ली । धीरे–धीरे समय व्यतीत होता गया और उस व्यक्ति का छोटा पुत्र उद्दंड पर उद्दंड होता गया । वह सदा अपने बड़े भाई को अपमानित करता रहता था परन्तु उस ज्योतिषी की बात को अपने अंतःकरण में दबाए हुए वह पिता अपने छोटे पुत्र की गलती होने पर भी सदा अपने बड़े पुत्र को ही फटकारता था ।

उस व्यक्ति का ज्येष्ठ पुत्र बचपन से ही अपने पिता के इस दुर्व्यवहार और अन्याय को सहन करता रहता और इसी आशा में जीता कि एक दिन उसके पिता उसको समझेंगे और कभी न कभी तो उनका हृदय उसके लिए पिघलेगा । समय बीतता गया और जब वर्षों तक ऐसा न हो सका तो उसने अपने पिता से विद्रोह कर दिया ।

इस बीच छोटा पुत्र उन दोनों पिता-पुत्र के मध्य लगी इस आग में और घी डालकर आनंद लेता रहा तथा उसकी नीयत अपने पिता व पूर्वजों की संपत्ति पर भी खराब हो चली । अति तो तब हो गई जब उसकी पत्नी भी उसके इस खेल में सम्मिलित हो गई और इस प्रकार से इस अन्याय भरे वातावरण को देखकर उस व्यक्ति का ज्येष्ठ पुत्र मन से अपने पिता से पूर्णतः विमुख हो गया ।

अपने पिता और कुटुम्ब के द्वारा किए गए इस अन्याय से अंतःकरण तक दुःखी हुए उस पुत्र ने एक दिन बालक ध्रुव की कथा पढ़ी और उसने भी बालक ध्रुव की भांति यह निश्चय किया कि हाड़ मांस से बने हुए उसके पिता से महान गोद ईश्वर की होती है अतः अब उसे भी वही प्राप्त करनी है और उसने अपना जीवन धर्म और ईश्वर भक्ति को समर्पित कर दिया ।

कलियुगी माता-पिता भले ही अपनी संतानों के साथ अन्याय करते हों परन्तु ईश्वर कभी भी अपनी किसी संतान के साथ भेदभाव नहीं करते । समय का चक्र ऐसा लगा कि ईश्वर की तपस्या और अपने भाग्य की कृपा से वह ज्येष्ठ पुत्र एक प्रसिद्ध व्यक्ति बनकर सभी ओर से यश, धन और सम्मान प्राप्त करने लगा । इधर इस व्यक्ति का छोटा पुत्र अनेक व्यसनों में पड़ गया और मदिरा की बुरी लत के कारण वह अपने उसी पिता के साथ प्रतिदिन अभद्र व्यवहार करने लगा, जिसने उसके गलत होते हुए भी सदा उसी का पक्ष लिया था ।

इतना सब होने के पश्चात् भी उस मूर्ख व्यक्ति के अवचेतन मन से कोई यह बात नहीं निकाल सका कि "तुम्हारी सेवा तो तुम्हारा छोटा पुत्र ही करेगा ।"

वह व्यक्ति प्रतिदिन अपने छोटे पुत्र से अपमानित होता और अगले दिन के सूर्योदय के साथ अपने भीतर नवीन ऊर्जा भरकर पुनः यही विचार करता कि मेरी तो सेवा, मेरा यही छोटा पुत्र करेगा और इस प्रकार से दिन व्यतीत होते रहे और वह व्यक्ति इसी आशा में जीता रहा कि मेरा ये छोटा पुत्र एक दिन अपने सभी व्यसनों को छोड़कर मेरी सेवा करेगा ।

वर्षों पहले की गई एक गलत भविष्यवाणी ने एक पूरा परिवार नष्ट कर दिया और उस व्यक्ति ने स्वयं अपने ही हाथों अपना योग्य ज्येष्ठ पुत्र खो दिया जो कि मन से अच्छा होने के उपरांत भी अपने पिता द्वारा किए गए दुर्व्यवहार और अन्याय को कभी भूल नहीं सका और उनसे दूर चला गया ।

यदि इन दोनों ही पुत्रों की जन्मकुंडली की बात करें तो ज्येष्ठ पुत्र की जन्म कुंडली में द्वितीय भाव (कुटुंब स्थान) में शत्रु राशि का राहु था, जिसके कारण उसे कुटुंब से सदा छल प्राप्त हुआ और उसे कुटुंब का सुख भी प्राप्त न हो सका इसके विपरीत छोटे पुत्र की जन्मकुंडली में कुटुंब स्थान का स्वामी शनि उच्च का होकर लाभ स्थान में स्थित था, जिसके कारण हर प्रकार की दुष्टता करने के उपरान्त भी उसे कुटुंब से सभी प्रकार का लाभ प्राप्त हुआ ।

इस कहानी से सभी महानुभाव यह विचार करें कि इसमें महान ज्योतिष शास्त्र की त्रुटि है, उस मूर्ख व्यक्ति की जिसने अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग करने के स्थान पर एक अधकचरे ज्योतिषी की बात मानी अथवा उस अधकचरे ज्योतिषी की, जिसने इस प्रकार की भविष्यवाणी की ?

मेरे विचार से यदि आधी गलती उस अधकचरे ज्योतिषी की है जिसने ऐसी भविष्यवाणी करके एक बालक का जीवन कष्टों में डाला तो आधी गलती उस मूर्ख व्यक्ति की भी है जो उस ज्योतिषी के द्वारा की गई नकारात्मक भविष्यवाणी को सत्य घटित करने में तो अपनी समस्त ऊर्जा लगाता रहा परन्तु उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र के अंतःकरण को कभी भी समझने का प्रयास नहीं किया ।

अब बात करते हैं उस ज्योतिषी के द्वारा इस कुंडली में की गई भूल की, तो उस ज्योतिषी को कहना यह चाहिए था कि— आपके ज्येष्ठ पुत्र की जन्मकुंडली के द्वितीय भाव (कुटुंब स्थान) में राहु का पृथक् करने वाला पाप प्रभाव है अतः आपको उसके साथ कभी भी छल पूर्वक व्यवहार नहीं करना चाहिए अन्यथा वह आपसे पृथक् होकर कहीं दूर चला जाएगा और आपके छोटे पुत्र की जन्मकुंडली में शनि द्वितीय भाव का स्वामी होकर लाभ स्थान में उच्च का होकर स्थित है अतः उसको सदा अपने कुटुम्ब से लाभ प्राप्त होता रहेगा ।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि ज्योतिष शास्त्र का पूर्ण ज्ञान हुए बिना कभी भी किसी के लिए अशुभ शब्द मुख से नहीं निकालना चाहिए । 

शास्त्र कहते हैं कि—
अदृष्टा शास्त्रकथनं ब्रह्महत्यैव गीयते। 
[बृहद्धर्म पुराण, उत्तरखण्ड २०।६]
जो व्यक्ति बिना शास्त्रों को ठीक से देखे ही उनके विषय में कथन दे देता है, उसके इस पाप को ब्रह्महत्या के समान समझना चाहिए ।

वर्तमान में भी लोग यूँ ही— आचार नियम, औषधियां, ज्योतिषीय तथ्य, सदाचार और धर्माधर्म का निर्णय आदि बिना शास्त्र वचन उद्धृत किये लिखते बताते रहते हैं, क्योंकि शास्त्र जानते नहीं; किन्तु शास्त्रो़ में ही कहा गया है कि उक्त बातें बिना शास्त्रवचन का प्रमाण दिये यदि कोई निर्दिष्ट करता है तो उसे ब्रह्महत्या का महापाप लगता है —
प्रायश्चितं चिकित्सा च ज्योतिषे धर्मनिर्णयम्।
विना शास्त्रेण यो ब्रूयात् तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
[ नारदमहापुराण, पूर्व० १२।६४ ]

महर्षि वाधूल भी कहते हैं कि—
 धर्म के सूक्ष्मतत्त्व को जाने बिना जो कोई मनमाना निर्णय देता है और अन्यथा ही प्रायश्चित्त बतलाता है तो पापी व्यक्ति का वह पाप सौगुना होकर निर्णय देने वाले व्यक्ति के मुख में प्रविष्ट हो जाता है ।
(वाधूलस्मृति १७६ - १७७)
"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava

शनिवार, 6 सितंबर 2025

चन्द्रग्रहण सितम्बर २०२५


७ सितम्बर २०२५ को चन्द्रग्रहण लगने जा रहा है जो भारत में भी दृष्टिगोचर होगा, इस कारण से भारत में इसके सूतक मान्य होंगे तथा सभी जातकों पर इसका भौतिक व आध्यात्मिक प्रभाव पड़ेगा । यह चन्द्रग्रहण, शनि की राशि 'कुंभ' और बृहस्पति के नक्षत्र 'पूर्वभाद्रपद' में लगेगा ।
आप सभी के लिए ग्रहण सम्बन्धित कुछ विशेष जानकारियां यहां उपलब्ध करवाने जा रहा हूँ —

ग्रहण के सूतक लगने से पूर्व ही घर के मंदिरों में स्थित यंत्र-कवच तथा गले या हाथ में बंधे हुए अभिमंत्रित किए हुए गंडे-कवच आदि उतार कर उन्हें कुशा के भीतर छुपा कर रख देना चाहिए तथा अगले दिन सूर्योदय के पश्चात् गंगाजल आदि से धोकर उन्हें अपने-अपने स्थानों पर पुनः प्रतिष्ठित करना चाहिए ।

घर के मंदिरों को भी सूतक लगने से पूर्व किसी मोटे वस्त्र आदि से ढक देना चाहिए और जब ग्रहण समाप्त हो जाए तो मूर्तियों को कुशा मिश्रित गंगाजल से स्नान करवाना चाहिए । यदि किसी के यहां मूर्ति न होकर चित्र हों तो उन पर इस कुशायुक्त जल के छींटे मारने चाहिए ।

जब ग्रहण समाप्त हो जाए तो घर की धुलाई-सफाई तो आप सभी करते ही हैं परन्तु कुछ लोग ग्रहण समाप्त होते ही भोजन कर लेते हैं जबकि भोजन उन्हें आगामी दिन के सूर्योदय के उपरान्त ही करना चाहिए ।


सूतकों में पूजा पाठ, अधिक कोलाहल, मूर्ति स्पर्श, भोजन, शयन आदि का निषेध है । इस समय पृथ्वी अधिक संवेदनशील हो जाती है और यदि अधिक कोलाहल किया जाए तो ब्रह्म चेतना कुपित होकर जीव को दंड दे देती है तथा हानिकारक जीवाणुओं एवं विषाणुओं की संख्या में अत्यधिक वृद्धि होने से घर के साथ-साथ वहां रखें भोज्य पदार्थ इत्यादि भी दूषित हो जाते हैं, ऐसे में ग्रहण समाप्त हो जाने के बाद गंगाजल - गोमूत्र से घर की शुद्धि करके अगले दिन सूर्योदय के पश्चात् नया बनाया गया भोजन ही ग्रहण करना चाहिए ।

सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक 'अरुन्तुद' नरक में वास करता है । सूर्यग्रहण में ग्रहण चार प्रहर (१२ घंटे) पूर्व और चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर (९ घंटे) पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए । बच्चे, वृद्ध और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं ।

ग्रहण के स्पर्श के समय स्नान, मध्य के समय होम, देव-पूजन और अंत में सचैल (वस्त्रसहित) स्नान तथा दान करना चाहिए । ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए तथा स्वयं भी वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए ।

ग्रहण के स्नान में कोई मंत्र नहीं बोलना चाहिए । ग्रहण के स्नान में गरम जल की अपेक्षा ठंडा जल, ठंडे जल में भी दूसरे के हाथ से निकाले हुए जल की अपेक्षा अपने हाथ से निकाला हुआ, निकाले हुए की अपेक्षा भूमि में भरा हुआ, भरे हुए की अपेक्षा बहता हुआ, बहते हुए की अपेक्षा सरोवर का, सरोवर की अपेक्षा नदी का, अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा का और गंगा की अपेक्षा भी समुद्र का जल पवित्र माना जाता है ।

ग्रहण के अंत में गायों को घास , पक्षियों को अन्न, चींटियों को भोजन, ब्राह्मणों को वस्त्र, अन्न तथा दक्षिणा आदि का दान करने से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है ।

ग्रहण के समय कोई भी शुभ व नया कार्य आरंभ नहीं करना चाहिए । ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है । गर्भवती स्त्रियों को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए ।

भगवान् वेदव्यासजी ने परम् हितकारी वचन कहे हैं— 'सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्यग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है । यदि गंगाजल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है ।

ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। (स्कन्द पुराण), भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिए। (देवी भागवत), अस्त के समय सूर्य और चन्द्रमा को रोगभय के कारण नहीं देखना चाहिए। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्णजन्म खं. ७५.२४)

ग्रहण का स्पर्श होते ही उसके सूतक समाप्त हो जाते हैं और मंत्र जप, स्तोत्र पाठ आदि करने का समय आरंभ हो जाता है । ग्रहणकाल और सूतक में यही भेद होता है कि सूतक काल में पूजा-पाठ वर्जित होता है जबकि ग्रहणकाल साधना के लिए सर्वोत्तम समय होता है । ग्रहणकाल में साधना पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके ही करनी चाहिए ।

गर्दन तक जल में खड़े होकर यदि कोई मंत्र साधना करता है तो उसका फल अमोघ होता है, यह कार्य किसी नदी तीर्थ आदि पर हो तो और भी उत्तम होता है, ऐसे में तीर्थ स्थल के अभाव में कुछ साधक अपने घरों में जल की टंकी में जल भरकर रख लेते हैं तथा उसमें गर्दन तक खड़े होकर मंत्र का जप करते हैं, यह बहुत ही उत्तम कार्य है । विद्वान मनुष्यों को ऐसा ही करना चाहिए ।

ग्रहण काल में देवी-देवताओं द्वारा पृथ्वी पर भेजी जाने वाली शक्तियां क्षीण पड़ जाती हैं और चारों ओर नकारात्मक ऊर्जाओं का दुष्प्रभाव फैल जाता है, ऐसे में जो मनुष्य देवी-देवताओं के मंत्र का जप इत्यादि करता है, इससे उस मंत्र से सम्बंधित देवी-देवताओं की बाधित ऊर्जा सीधे उस मनुष्य से अत्यन्त तीव्रता के साथ जुड़ने लगती है । यही कारण है कि किसी भी अन्य काल की अपेक्षाकृत ग्रहण काल में मंत्र बहुत तीव्रता और शीघ्रता से सिद्ध हो जाता है ।

ग्रहण काल में राहु-केतु के मंत्र जप करने से बचना चाहिए क्योंकि उन्हीं की शक्तियों के कारण देव शक्तियों को कष्ट प्राप्त हो रहा होता है, ऐसे में हमें राहु-केतु के मंत्रों का जप करके उनकी शक्तियां नहीं बढ़ानी चाहिए तथा उसके स्थान पर उनके अधिष्ठात्री देवी-देवता, भगवती दुर्गा तथा भगवान् शंकर के मंत्रों का जप करना चाहिए ।

एक बार मंत्र सिद्धि हो जाने पर वह मंत्र जपना छोड़ना नहीं चाहिए, ग्रहण काल में सिद्ध किए हुए मंत्र का जितना अधिक जप किया जाता है , उस मंत्र के फल देने की क्षमता उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है ।

जो साधक किसी परम्परा प्राप्त गुरु द्वारा दीक्षित नहीं हैं, उन्हें मंत्रों का जप करने के स्थान पर उच्च कोटि के देवी–देवताओं के शक्तिशाली स्त्रोतों का संस्कृत में पाठ करना चाहिए । जिन्हें संस्कृत नहीं आती वह सुंदरकांड अथवा हनुमान चालीसा आदि का पाठ करके उसे अपने लिए सिद्ध कर सकते हैं । 

स्मरण रहे कि जो साधक जिस साधना में अधिकृत है, वह अपने अधिकार की सीमा में आने वाले मंत्रों का अनुष्ठान करके ही सिद्धि अथवा मुक्ति प्राप्त कर सकता है । अपने अधिकार की सीमा का अतिक्रमण करके इधर-उधर से प्राप्त किया हुआ मंत्र उस अनधिकृत व्यक्ति का उत्थान करने के स्थान पर उल्टा विनाश ही करता है । अतः किसी भी प्रकार के प्रमाद में न पड़कर शास्त्रों में वर्णित अपने अधिकार की सीमा में आने वाले मंत्रों का ही जप करें । 

मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखने वाले वेदपाठी ब्राह्मणों को ग्रहणकाल में शाबर मंत्रों को सिद्ध करने से बचना चाहिए तथा उसके स्थान पर गायत्री-महामृत्युंजय-श्रीविद्या-दस महाविद्या जैसी उच्च कोटि की विद्याओं के मंत्रों को सिद्ध करने का प्रयास करना चाहिए ।

विशेष— इस चन्द्रग्रहण के प्रभाव से विश्वभर में आगामी डेढ़ माह तक विभिन्न स्थानों पर शक्तिशाली भूकंप तथा सुनामी आने का भय बना रहेगा । बृहस्पति के नक्षत्र पर ग्रहण लगने के कारण आगामी डेढ़ माह के भीतर किसी बड़े धर्मगुरु की मृत्यु अथवा मृत्यु तुल्य कष्ट का समाचार प्राप्त होगा ।

"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

पशुपालन और धर्म

 "भौतिक सर्वोच्च न्यायालय" द्वारा कुत्तों से सम्बंधित विषय में निर्णय आने के पश्चात् समूचे भारत में कुत्ता प्रेमियों तथा विरोधियों के मध्य विवाद बढ़ गया है । इस विषय में धर्म शास्त्र क्या कहते हैं ? आइए जानते हैं—


पशुपालन सम्बन्धी धर्मशास्त्रीय नियम—
मार्जारकुक्कुटच्छागश्ववराहविहङ्गमान्।
पोषयन्नरकं याति तमेव द्विजसत्तम॥ (विष्णुपुराण २।६।२१; ब्रह्मपुराण २२ । २०)

कुक्कुटश्वानमार्जारान् पोषयन्ति दिनत्रयम्।
इह जन्मनि शूद्रत्वं मृतः श्वा चाभिजायते॥ (वाधूलस्मृति १७०)
बिल्ली, मुर्गा, बकरा, कुत्ता, सूअर तथा पक्षियों को पालने वाला मनुष्य नरक (कृमिपूय या पूयवह) में गिरता है।

स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति धिष्ण्यमिष्टापूर्त क्रोधवशा हरन्ति।
ततो विचार्य क्रियतां धर्मराज त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति।। (महाभारत, महाप्रस्थानिक० ३।१०)
कुत्ता रखने वालों के लिये स्वर्ग लोक में स्थान नहीं है । उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवाने का जो पुण्य होता है, उसे 'क्रोधवश' नामक राक्षस हर लेते हैं ।


कुक्कुटे शुनके चैव हविर्नाश्नन्ति देवताः। (महाभारत, अनु० १२७।१६)
घर में मुर्गे और कुत्ते के रहने पर देवता उस घर में हविष्य ग्रहण नहीं करते ।
    

चाण्डालश्च वराहश्च कुक्कुटः श्वा तथैव च।
रजस्वला च षण्डश्च नेक्षेरन्नश्नतो द्विजान्॥
होमे प्रदाने भोज्ये च यदेभिरभिवीक्ष्यते।
दैवे हविषि पित्र्ये वा तद्गच्छत्ययथातथम्॥ (मनुस्मृति ३। २३९-२४०)
यदि कुत्ते, सूअर और मुर्गे की दृष्टि पड़ जाय तो देवपूजन, श्राद्ध- तर्पण, ब्राह्मण-भोजन, दान और होम-ये सब निष्फल हो जाते हैं।

मार्जारश्च   गृहे  यस्य  सोऽप्यन्त्यजसमो  नरः ।
  भोजयेद्यस्तु विप्रेन्द्रान् मार्जारान् सन्निधौ यदि ।।
   तच्चाण्डालसमं  ज्ञेयं  नात्र कार्या  विचारणा ।।
जिस घर में बिल्ली रहती है वह चाण्डाल के समान होता है । यदि कोई मनुष्य बिल्ली की सन्निधि में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराता है - तो उसे चाण्डाल के समान जानना चाहिए ।

अजाश्वानखरोष्ट्राणां मार्जनात्तुषरेणुकान् ।
   संस्पृशेद्यदि मूढात्मा श्रियं हन्ति हरेरपि ।। "
यदि कोई मूढ बुद्धिवाला (मनुष्य ) बकरी - कुत्ता - गधा - ऊंट आदि से उठी हुई धूल अथवा झाडू लगाने से उठी हुई धूल का स्पर्श करता है—तो उसकी लक्ष्मी नष्ट हो जाती है, फिर चाहे वह विष्णु ही क्यों न हों।


  गावो देवाः सदा रक्ष्याः पाल्याः पोष्याच सर्वदा। (बृहत्पराशरस्मृति ५। २३)
गौओं का सदा दान करना चाहिये, सदा उनकी रक्षा करनी चाहिये और सदा उनका पालन-पोषण करना चाहिये ।

गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः।
तस्मै तुष्टा: प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान्॥ (महाभारत, अनु० ८१।३३)
गोषु भक्त लभते यद् यदिच्छति मानवः।
स्त्रियोऽपि भक्ता या गोषु ताश्च काममवाप्नुयु:॥
पुत्रार्थी लभते पुत्र कन्यार्थी तामवाप्नुयात्।
धनार्थी लभते वित्तं धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात्॥
विद्यार्थी चाप्नुयाद् विद्यां सुखार्थी प्राप्नुयात् सुखम्।
न किञ्चिद् दुर्लभ चैव गवा भक्तस्य भारत। (महाभारत, अनु० ८३।५०-५२)
जो मनुष्य गौओं की सेवा करता है, उसे गौएँ अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान करती हैं। वह गौभक्त मनुष्य पुत्र, धन, विद्या, सुख आदि
जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त हो जाती है। उसके लिये कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होती ।

निविष्ट गोकुल यत्र श्वास मुञ्चति निर्भयम्।
विराजयति तं देशं पापं चास्यापकर्षति॥ (महाभारत, अनु०५१। ३२)
गौओं का समुदाय जहाँ बैठकर निर्भयतापूर्वक साँस लेता है, उस स्थान के सारे पापों को खींच लेता है ।

यस्यैकापि गृहे नास्ति धेनुर्वत्सानुचारिणी ॥
मङ्गलानि कुतस्तस्य कुत्तस्तस्य तमः क्षय:। (अत्रिसंहिता २१८-२१९)
जिसके घर में बछड़े सहित एक भी गौ नहीं है, उसका मंगल कैसे होगा और उसके पापों का नाश कैसे होगा?

‘गौएँ स्वर्ग की सीढ़ियाँ हैं, गौएँ स्वर्ग में भी पूजी जाती हैं, गौएँ समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली देवियाँ हैं, उनसे बढ़कर और कोई श्रेष्ठ वस्तु नहीं है।'
—(महाभारत, अनु० ५१ । ३३)

'जिसके घर में बछड़े सहित एक भी गौ नहीं है, उसका मंगल कैसे होगा और उसके पापों का नाश कैसे होगा ?"
—(अत्रिसंहिता २१८ - २१९ )

'राजन्! जो प्यास से व्याकुल गायों के जल पीने में विघ्न डालता है, उसे ब्रह्महत्यारा समझना चाहिये।'
—(महाभारत, अनु० २४ । ७)

'जो नराधम मन में भी गायों को दुःख देने की इच्छा कर लेता है, उसे चौदह इन्द्रों के काल तक नरक में रहना पड़ता है। '
—(पद्मपुराण, पाताल० १९ । ३४ )

'राजन्! जो मनुष्य जान-बूझकर भगवान्‌ की निन्दा करता है और गायों को दुःख देता है, उसका नरक से कभी छुटकारा नहीं हो सकता।'
—(पद्मपुराण, पाताल० १९ । ३६ )

'गौ की हत्या करने वाले, उसका मांस खाने वाले तथा गोहत्या का अनुमोदन करने वाले लोग गौ शरीर में जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षों तक नरक में डूबे रहते हैं।
(महाभारत, अनु० ७४ । ४)

'गोभक्त मनुष्य जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त होती है। स्त्रियों में भी जो गौओं की भक्त हैं, वे मनोवाञ्छित कामनाएँ प्राप्त कर लेती हैं । पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्या । धन चाहने वाले को धन और धर्म चाहने वाले को धर्म प्राप्त होता है । विद्यार्थी विद्या पाता है और सुखार्थी सुख । भारत ! गोभक्त के लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं है ।'
—(महाभारत, अनु० ८३ । ५०-५२ )

'जो गौओं को प्रतिदिन जल और तृण सहित भोजन प्रदान करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है।'
—(बृहत्पराशरस्मृति ५। २६-२७ )

विशेष—
वास्तव में कुत्ते-बिल्ली आदि का घर से बाहर पालन करना, उनकी रक्षा करना दोष नहीं है, प्रत्युत में प्राणिमात्र का पालन-पोषण करना मनुष्य का विशेष कर्तव्य है । (यदि वह कुत्ते-बिल्ली मनुष्यों तथा किसी निर्दोष जीवन को हानि न पहुंचा रहे हों तब) ।
परन्तु कुत्ते-बिल्ली आदि के साथ घुल-मिलकर रहना, उनको साथ में रखना, उनका स्पर्श करना, उनमें आसक्ति करना, उनसे अपनी जीविका चलाना आदि यह सब महापाप हैं ।

"शिवार्पणमस्तु"
-ASTROLOGER MANU BHARGAVA 

गुरुवार, 6 मार्च 2025

पिशाच योग (शनि-राहु युति २०२५)


शीघ्र ही गोचर में एक बहुत बड़ा दुर्योग बनने जा रहा है जिसके विषय में मैं बहुत समय पूर्व से संकेत करता आ रहा हूँ , ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसका नाम है—'पिशाच योग'।

२९ मार्च को शनि द्वारा राशि परिवर्तन कर लेने के साथ ही गोचर के अन्तर्गत 'मीन राशि' में शनि-राहु की युति बन जायेगी जो कि १७ मई तक रहेगी, १८ मई को राहु-केतु द्वारा राशि परिवर्तन करने के उपरान्त ही शनि-राहु की यह युति भंग हो सकेगी । ब्रह्माण्ड में होने जा रही अत्यन्त दुर्लभ यह घटना पिशाच योग को जन्म देगी ।

शनि-राहु जैसे दो पापी ग्रहों की युति किसी भी अवस्था में शुभ नहीं कही जा सकती । अपने जीवनकाल में अब तक मैंने जितनी भी जन्म-कुंडलियों में शनि-राहु की युति पाई है, उनमें उस जातक के लिए मैंने विशेष विध्वंसात्मक तत्वों की अधिकता ही देखी है, जिनका उल्लेख करके मैं इस ब्लॉग को पढ़ने वाले जनमानस के हृदयों में भय उत्पन्न नहीं करना चाहता ।

यद्यपि गोचर में दो अत्यन्त पृथकतावादी पाप ग्रहों की होने जा रही यह युति अनेक दुर्योगों को जन्म देने वाली सिद्ध होगी तथापि राहु द्वारा १६ मार्च को शनि के नक्षत्र (उत्तराभाद्रपद) से निकलकर, बृहस्पति के नक्षत्र (पूर्वाभाद्रपद) में संचार करने के कारण राहु के स्वभाव में ज्ञान तथा अध्यात्मिक भावना आ जाएगी, जिसके कारण वह धार्मिक जातकों की उतनी हानि नहीं कर सकेंगे जितनी कि शनि के साथ होने वाली इस युति के कारण कर सकते थे ।

यह सत्य है कि गोचर में शनि-राहु की युति होना कभी भी एक उत्तम योग नहीं होता किन्तु इस योग के बनने के समय राहु द्वारा बृहस्पति के नक्षत्र में संचार करने से यह समय तंत्र साधना के लिए अत्यन्त शुभ हो जाएगा ।

राहु गूढ़ रहस्यों-रहस्यमयी विद्याओं, शनि वैराग्य तथा बृहस्पति ज्ञान व अध्यात्म के कारक ग्रह होते हैं । ऐसे में राहु द्वारा बृहस्पति की राशि तथा बृहस्पति के ही नक्षत्र में शनि के साथ युति को प्राप्त हो जाने के कारण साधकों को ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति की सहायता से रहस्यमयी सिद्धियां प्राप्त करने के लिए नई ऊर्जा प्राप्त होगी, जिसके कारण तन्त्र साधनाओं के लिए यह समयकाल अत्यन्त विलक्षण हो जाएगा । इस समय साधकों की सुषुम्ना नाड़ी भी अधिक समय तक जाग्रत रहेगी, जिसके कारण उन्हें सिद्धियां प्राप्त करने में अधिक समय नहीं लगेगा ।

यदि इस युति के परिणाम से उत्पन्न दुर्योगों की बात करें तो—सभी जातकों की जन्मकुंडली में शनि जिन-जिन भावों के स्वामी और कारक होंगे, उनसे सम्बन्धित पदार्थों को राहु हानि पहुंचाएंगे तथा शनि की छाया लिए हुए राहु जहां-जहां दृष्टि डालेंगे, वहां-वहां वह दृष्टियां भी विशेष अनिष्टकारी हो जायेंगी (शनि की छाया ग्रहण कर लेने के प्रभाव से) ।

अतः बुद्धिमान मनुष्यों को इस अवधिकाल में राहु के निमित्त जो दान शास्त्रों में बताए गए हैं, शनिवार के दिन (शनि की होरा में ) उन दानों को करना चाहिए तथा नील वर्ण के वस्त्रों को धारण करने से, तम्बाकू से बने उत्पादों का सेवन करने से व अधिक पुरानी काष्ठ को अपने समीप रखने से बचना चाहिए ।

राहु, भगवती दुर्गा के परम् भक्त होते हैं इसलिए स्मार्त्त अथवा शाक्त परम्परा से दीक्षित योग्य ब्राह्मण गुरु द्वारा प्राप्त भगवती के मंत्र' का जप करने से राहु अपने नकारात्मक प्रभाव को समाप्त कर देते हैं ।

इसके अतिरिक्त जो जातक अदीक्षित हैं वह बिना प्रणव (ॐ) का उच्चारण किए देवी के विभिन्न स्त्रोतों का पाठ कर सकते हैं ।

जो जातक किसी कारणवश यह भी नहीं कर सकते वह किसी 'जाग्रत देवालय' में जाकर भगवती को नारियल व श्रृंगार की वस्तुएं भेंट करके उनसे अपने कल्याण की प्रार्थना कर सकते हैं ।

गोचर में लगभग ५० दिन के लिए बनने जा रहे शनि-राहु योग के इस अवधिकाल में भगवती की योगिनी शक्ति, शनि-राहु की सहायता से विश्व भर में भूकंप, सुनामी, चक्रवात लाकर अनेक प्राणियों को विदीर्ण करेगी । अतः लगभग ५० दिनों का यह समयकाल मौसम वैज्ञानिकों के लिए बहुत चुनौतियों से भरा हुआ रहने वाला है । इसके अतिरिक्त मार्च के महीने में पड़ने वाले चंद्रग्रहण व सूर्यग्रहण, भचक्र में एक नवीन प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का निर्माण कर देंगे, जिसके कारण यह ५० दिन विश्व भर में प्राकृतिक आपदाओं तथा दुर्घटनाओं के लिए और भी अधिक घातक हो जाएंगे ।

इधर नीच राशि में स्थित मंगल भी दुर्घटनाओं तथा अग्निकांडों की ओर संकेत कर रहा है ।  १४ मार्च को पड़ने जा रहे चंद्रग्रहण के एक दिन पूर्व से ही विश्वभर के भूगर्भ वैज्ञानिकों के लिए चुनौतियां आरम्भ हो जायेंगी, जिनका निर्वाहन करने का समय भी उनको प्राप्त न हो सकेगा । विद्वान मनुष्यों को बड़े भूकंपों से सावधान रहने की आवश्यकता है ।

यदि और अधिक सरल शब्दों में कहूं तो शनि-राहु की युति के इस अवधिकाल को ईश्वर की शरण में रहकर शान्ति के साथ निकालने की आवश्यकता है क्योंकि मीन राशि में होने जा रही इस युति के कारण अब तक वहां संचार कर रहे उच्च के शुक्र भी अपनी शुभता को खो देंगे तथा वह विभिन्न जातकों के जिस-जिस भाव के स्वामी व कारक होंगे वहां से सम्बन्धित पदार्थों की हानि करने लगेंगे ।

नोट— 

[ ] शनि के राशि परिवर्तन कर लेने के साथ ही कुछ जातकों की ढैया-साढ़े साती समाप्त, तो कुछ की आरम्भ होगी किन्तु यह इस ब्लॉग का विषय न होने से इस विषय में यहां जानकारी नहीं दे रहा हूँ । यदि संभव हुआ तो उसके लिए अलग से एक ब्लॉग लिख दूंगा । 


[ ] ज्योतिष शास्त्र में श्रद्धा रखने वाले विद्वान मनुष्यों को २९ मार्च से लेकर १८ मई तक अपने बच्चों की डिलीवरी करवाने से बचना चाहिए । यदि संभव हो सके तो २९ मार्च से पूर्व (शनि-राहु युति बनने से पूर्व) अथवा ६ जून के पश्चात् (मंगल के नीच राशि में संचार करने के कारण) ही बच्चों की डिलीवरी हो अन्यथा उनकी जन्म-कुंडली में जीवनभर के लिए शनि-राहु की युति तथा नीच राशि के मंगल की स्थिति बन जाएगी, जो कि बहुत कष्टकारी सिद्ध होगी । 

"शिवार्पणमस्तु"

—Astrologer Manu Bhargava

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

सनातन धर्म की आन्तरिक चुनौतियां भाग—३

भाग १ तथा २ देखने के लिए इन लिंक्स पर जाएं—

९ अक्टूबर को देव गुरु बृहस्पति 'वृष राशि' में, 'मृगशिरा नक्षत्र के द्वितीय चरण' में वक्री होने जा रहे है, जिसका शुभाशुभ प्रभाव सभी राशि-लग्न वाले जातकों पर पड़ने वाला है । इधर 'शनि' पहले से ही वक्री चल रहे हैं जो कि १५ नवम्बर को मार्गी होंगे ।

गोचर में संचार कर रहे ग्रहों की परिवर्तित होती स्थितियों के कारण ही हमारे जीवन में भी प्रत्येक क्षण परिवर्तन आते रहते हैं (यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे) । अतः ये मान-सम्मान , हानि-लाभ, सुख-दुःख, जय-पराजय और जीवन-मृत्यु सब कुछ परिवर्तनशील है, इनमें से कुछ भी स्थिर नहीं है । इसलिए विद्वान मनुष्यों को इनमें से किसी से भी मोहित नहीं होना चाहिए और निरन्तर अपने इष्टदेव के मंत्रों का जप करते हुए सदा उन्हीं की शरण में रहना चाहिए ।

ईश्वर द्वारा ज्योतिष शास्त्र के निर्माण का कारण ही यह था कि मनुष्य अपनी जन्मकुंडली तथा गोचर में संचार कर रहे ग्रहों की स्थितियों को देखकर, उनके द्वारा स्वयं पर पड़ने वाले शुभाशुभ परिणामों का अवलोकन करके, मंत्र-यज्ञ-दान-रत्न आदि चिकित्साओं द्वारा अपना उपचार करते हुए, सुखी जीवन व्यतीत कर सके और सरलता से मोक्ष तक की अपनी यात्रा संपन्न कर सके । यही कारण है कि ज्योतिष को ईश्वर का दिखाया हुआ प्रकाश (ज्योति+ईश) कहते हैं ।


वर्तमान काल की भांति, प्राचीन काल में ज्योतिष शास्त्र केवल भाग्य बताने अथवा मुहूर्त आदि निकालने तक ही सीमित नहीं था । प्राचीन काल में ज्योतिषीय गणना के आधार पर राजाओं के यहां नियुक्त विद्वान राजज्योतिषी उन्हें उनके राज्य में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं की सूचना पहले से ही दे दिया करते थे, जिससे प्रजा तथा उस राज्य की सुरक्षा की जा सके । ऐसी ही कितनी ही भविष्यवाणियां तो स्वयं मैं ही वर्षों से करता हुआ आ रहा हूँ, जो कि पूर्णतः सत्य घटित हुई हैं । जो लोग मुझे वर्षों से जानते हैं , वह इस बात के साक्षी हैं ।

स्वयं व्यास जी ने महाभारत युद्ध होने से पूर्व 'भारतवर्ष' (सम्पूर्ण आर्यवर्त) में पड़ने वाले सूर्य-चंद्र ग्रहण तथा गोचर में ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति देखकर, राजा धृतराष्ट्र को महाभारत के युद्ध में होने वाले महाविनाश की चेतावनी पहले ही दे दी थी, जिसका विवरण हमें महाभारत ग्रंथ में प्राप्त होता है । ऐसे में जब आज हम देखते हैं कि मलेच्छ प्रवृत्ति के धर्मद्रोही तत्वों के साथ-साथ कुछ अशास्त्रीय कथावाचक (सभी नहीं) भी ज्योतिष शास्त्र की निंदा करने में लगे हुए हैं तो इसके मूल में और कुछ नहीं कलियुग का प्रभाव ही है ।


वैदिक परम्परा प्राप्त कथावाचकों की आड़ लेकर, उनकी पीठ पीछे छुपकर, स्वयं ही मंत्र दीक्षा लेने-देने, यज्ञ करने-करवाने तथा व्यासपीठ पर बैठकर कथा कहने के लिए अनधिकृत होते हुए भी, अपने कल्ट में ब्राह्मणों से लेकर मलेच्छों तक को मंत्र दीक्षा दे रहे ऐसे अनेक 'वर्णेतर' तत्व हमें यह बताने का कष्ट करेंगे कि बिना शुभ मुहूर्त के क्या वह कोई कथा-व्यास पूजन-यज्ञ आदि करवा सकते हैं ? यदि हां तो कैसे और यदि नहीं तो ये मुहूर्त इन्हें कौन बताएगा ?
इसका उत्तर है—ज्योतिष शास्त्र ।

वास्तव में ज्योतिष शास्त्र वेद के ६ अंग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छंद, निरुक्त) जिन्हें वेदांग कहा जाता है, में से एक है और यह वेदांग में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखता है कि इसे वेद के नेत्र का स्थान प्राप्त है । महर्षि पाणिनि ने भी ज्योतिष शास्त्र को वेदपुरुष का नेत्र कहा है तथा जितने प्राचीन वेद हैं, उतना ही प्राचीन ज्योतिष शास्त्र भी है ।

जिन महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा लिखे गए पुराणों की कथा सुनाकर ये अशास्त्रीय-अनाधिकृत कथावाचक और कल्ट गुरु अपने यजमानों से मान-सम्मान तथा धन आदि प्राप्त करते हैं, उन्हीं महर्षि वेदव्यास जी के पिता महर्षि पराशर जी, ज्योतिष शास्त्र (वैदिक ज्योतिष) के एक महान ज्ञाता थे, जिनके द्वारा लिखित ग्रंथ 'बृहत् पराशर होरा शास्त्र' में वर्णित ज्योतिष के गूढ़ सिद्धांतों का अनुसरण करके ही अधिकांश ज्योतिषाचार्य, सभी जातकों को उनका भविष्यफल बताया करते हैं ।

अब बात करते हैं कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वह कौन से ग्रह तथा भाव-भावेश होते हैं जिनके कारण कोई व्यक्ति व्यासपीठ पर बैठकर, अपनी कथाओं के माध्यम से हजारों-लाखों श्रोताओं को ज्ञान देकर उनका जीवन बदलने में सक्षम हो पाता है ? 
इसका उत्तर है— जन्मकुंडली के द्वितीय भाव-द्वितीयेश (वाणी स्थान और उसका स्वामी ग्रह) तथा नवम भाव-नवमेश (धर्म स्थान और उसका स्वामी ग्रह) पर पड़ने वाले शुभ ग्रहों का प्रभाव तथा वाणी के कारक बुध और ज्ञान के कारक बृहस्पति का उसकी जन्मकुंडली में शुभ स्थिति में बैठना ।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किसी भी मनुष्य की वाणी तथा लेखन का कारक बुध होता है और ज्ञान तथा आध्यात्मिकता का कारक बृहस्पति । ऐसे में कोई भी ऐसा धर्मगुरु जो कि अच्छा वक्ता-लेखक-ज्ञानी तीनों हो, तो इसका कारण उसकी जन्मकुंडली में बुध तथा बृहस्पति की स्थिति का अत्यन्त शुभ होना होता है । ऐसे में यदि उसके द्वितीय भाव-द्वितीयेश, नवम भाव-नवमेश पर भी शुभ ग्रहों का प्रभाव हो, तो वह एक अच्छा कथावाचक-धार्मिक वक्ता बनकर देश-विदेश में ख्याति प्राप्त करता है किन्तु वर्णेतर होने अथवा राहु के पाप प्रभाव के कारण अनेक बार ऐसा व्यक्ति किसी नए 'कल्ट' के निर्माण का भी कारण बन जाता है । उसकी जन्मकुंडली में इन ग्रहों की स्थिति भी विशाल जनसमुदाय को अपनी ओर आकर्षित करने में उसकी पूरी सहायता करती है, यही कारण है कि विश्व भर में बहुत से ऐसे कल्ट बनते आए हैं और बनते रहेंगे जिनके धर्मगुरुओं (जो वास्तव में अधर्म गुरु होते हैं) ने अपनी जन्मकुंडलियों में बने हुए ऐसे योगों का दुरुपयोग करके विशाल जनसमुदाय को मूर्ख बनाने का कार्य किया । ऐसे अनेक कल्ट गुरुओं के ग्रहों का प्रभाव तो ऐसा है कि उनकी मृत्यु के सैंकड़ों वर्ष व्यतीत होने के पश्चात् भी आज तक लोग उनकी लिखी हुई पुस्तकें (कुछ किताबें भी) लाकर पढ़ते हैं और उनके कल्ट को आगे बढ़ा रहे हैं ।

किसी भी जातक की जन्मकुंडली का द्वितीय भाव जो कि धन का भी भाव होता है, द्वितीयेश (धनेश) धनभाव का स्वामी ग्रह होता है तथा धन का कारक देव गुरु बृहस्पति होता है । ऐसे में उस अशास्त्रीय धर्मगुरु-कथावाचक-कल्ट गुरु की जन्मकुंडली में इन पर पड़ने वाले शुभ प्रभाव के कारण उसको अपने जीवन में कभी धन की भी कोई कमी नहीं रहती । अतः इससे यह सिद्ध होता है कि ज्योतिष शास्त्र की निंदा करने वाले कल्ट गुरु एवं अशास्त्रीय कथावाचक भी स्वयं ग्रहों के ही आधीन होते हैं ।

यदि ये सारे ज्योतिषीय सूत्र छोड़ भी दिए जाएं (क्योंकि ज्योतिष के ज्ञान के बिना इनको यह सूत्र समझ में नहीं आएंगे), तो भी मैं अपने ज्ञान की वृद्धि के लिए भगवान् श्रीराम-कृष्ण आदि के नाम से अपनी दुकान चलाने वाले इन सभी महानुभावों से आज यह समझना चाहता हूँ कि वह कौन से ऋषि थे जिन्होंने भगवान् श्री राम चंद्र की जन्मकुंडली देखकर उनके जीवन में प्राप्त होने वाले दुःखों की भविष्यवाणी कर दी थी और क्या महर्षि गर्ग ने भगवान् श्री कृष्ण की जन्मकुंडली देखकर उनका नामकरण संस्कार नहीं किया था ? 

वास्तव में सत्यता यह है कि आज जितने भी परम्परा प्राप्त प्रामाणिक धर्माचार्य अथवा कथावाचक हैं, वह सभी ज्योतिष शास्त्र का महत्व जानते हैं और ज्योतिष शास्त्र को बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं । वह जानते हैं कि ज्योतिष की निंदा अर्थात् वेद की निंदा है (वेदांग होने के कारण) और किसी वेद निंदक को कथावाचक या धर्माचार्य कहना तो दूर की बात है, वह तो हिंदू कहलाने के योग्य भी नहीं होता क्योंकि—
वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्यय: ।
अर्थात्— वेदों में विहित बताए गये कर्मो को करना धर्म है और उसके विपरीत (वेदों में निषिद्ध) कार्यों को करना अधर्म है।

ऐसे वह नकली कथावाचक और कल्ट गुरु, जो वर्णेतर और धर्मेतर होने के कारण व्यासपीठ पर बैठने के लिए अधिकृत भी नहीं हैं (जिनमें से अधिकांश तो उस कल्ट के ही अनुयायी है, जिन्होंने अनधिकृत होते हुए भी आजकल भगवान् श्री कृष्ण के नाम पर देश-विदेश में धर्म की दुकान लगाई हुई है), उनसे मुझे यही कहना है कि—

यो नरः शास्त्रमज्ञात्वा ज्यौतिषं खलु निन्दति ।
रौरवं नरकं भुक्त्वा चान्धत्वं चान्यजन्मनि ।।
अर्थात् —
जो मानव ज्योतिष शास्त्र को अच्छी प्रकार न समझकर उसकी निंदा करता है, वह रौरव नामक नरक में वास करके अन्धा होकर जन्म ग्रहण करता है।।
(बृहतपाराशर होरा शास्त्रम्)

"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava

शनिवार, 22 जून 2024

लोकेष्णा


 
अज्ञान के अंधकार से व्याप्त मनुष्य की बुद्धि और मन सदा तीन प्रकार की तृष्णाओं से घिरा रहता है ।

१- वित्तेष्णा, २- पुत्रेष्णा और ३- लोकेष्णा

वित्तेष्णा अर्थात् धन प्राप्ति की इच्छा, पुत्रेष्णा
अर्थात् पुत्र (संतान) प्राप्ति की इच्छा अथवा उसमें आसक्ति और लोकेष्णा अर्थात् "संसार भर में मान-सम्मान, यश, प्रसिद्धि प्राप्त करने की तृष्णा ।"
मेरे इस ब्लॉग का विषय है 'लोकेष्णा'। अतः यहां केवल इसी विषय पर बात करेंगे ।

वर्तमान में लोकेष्णा की तृष्णा में मनुष्य इस प्रकार से घिरे हुए हैं कि उन्हें इस बात का बोध भी नहीं है कि इसके अंधे कुएं में गिरकर वह स्वयं की आत्मा से कितने दूर निकल चुके हैं । स्वयं को परम् सात्विक समझने वाला मनुष्य, जिसमें वित्तेष्णा और पुत्रेष्णा यदि न भी हो तो वह भी लोकेष्णा के प्रभाव से बच नहीं पाता और लोकेष्णा
भी कैसी कि मनुष्य अपने ही जैसे नाशवान हाड़ मांस के शरीरों से सम्मान प्राप्त करने की इच्छा रखने लगता है तथा वह ऐसे संसार से यश प्राप्ति की इच्छा करता है जो दृष्टिगोचर तो होता है किन्तु वास्तव में है ही नहीं ("ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:" के सिद्धांत के आधार पर) ।

लोकेष्णा की इस अग्नि में जलकर कितने ही राजा-महाराजा, साधु-संत और राजनेता आदि स्वयं तो सर्वनाश को प्राप्त हो ही चुके हैं, उनकी इस लोकेष्णा की तृष्णा को शांत करने के लिए कितने ही ऐसे मनुष्यों को भी अपना बलिदान देना पड़ा है, जिनकी कोई भूल भी नहीं थी ।

आज भारत में एक 'महामानव' विश्व शांति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के लिए तथा भारत में अपने परम शत्रुओं से सम्मान प्राप्ति की लालसा में अपने ही धर्म के करोड़ों मनुष्यों का जीवन दाँव पर लगाए हुए है । १९४७ में भी यही हुआ था जब एक 'महामानव' ने अपनी लोकेष्णा
की अंधी वासना को शांत करने के लिए अपने ही धर्म के लाखों लोग कटवा दिए थे । प्राचीन काल में भी अनेकों बार दूसरों की लोकेष्णा की अंधी अग्नि को शांत करते-करते न जाने कितने ही प्राणियों को अपना बलिदान देना पड़ा है ।

लोकेष्णा की इस अंधी अग्नि से सामान्य जन भी अछूता नहीं है । माता-पिता भी अपने बच्चों को उनकी देह के अभिमान से मुक्त होने का ज्ञान न देकर उन्हें लोकेष्णा की इस अग्नि में झोंक देते हैं । वह उन्हें यह ज्ञान नहीं देते कि तुम्हें अपना जीवन इस देह के होने के अभिमान से मुक्त होकर ईश्वर प्राप्ति में लगाना है और इतना लगाना है कि किसी से यह सुनने की इच्छा भी शेष न रहे कि देखो ! "वह बालक ईश्वर की कितनी भक्ति करता है " क्यूंकि यदि ऐसा हुआ तो उस बालक की भक्ति में भी लोकेष्णा ही लोकेष्णा व्याप्त होगी, ईश्वर प्राप्ति की इच्छा नहीं ।

सभी दिशाओं से अपने लिए वाहवाही और प्रशंसा लूटने की इच्छाओं ने मानवीय चेतना को इतना निम्न स्तर का बना दिया है कि सात्विक से सात्विक आचरण करने वाला मनुष्य भी इसके प्रभाव से बच नहीं पाता और यहीं उसकी आत्मा का पतन हो जाता है ।

माला पहनते हुए मेरा चित्र समाचार पत्र में आ जाए, किसी सांसद-विधायक के साथ मेरी फोटो खिंच जाए, मेरी संतान को विद्यालय में प्रथम पुरस्कार मिल जाए, मेरे द्वारा बनाई गई वस्तु अथवा लिखी हुई पुस्तक को चारों ओर से प्रशंसा प्राप्त हो जाए, दूर देशों तक मेरा अथवा मेरी संतान का नाम व्याप्त हो जाए, मैं जिस भी समारोह में जाऊं वहां मेरी जय-जयकार हो, फेसबुक-इंस्टाग्राम-यूट्यूब पर मेरे अभिनय, कला और नृत्य आदि की पोस्ट पर मुझे ढेरों लाइक्स और अच्छे कमेंट्स प्राप्त हों, मैं यदि शिक्षक-शिक्षिका हूँ तो विद्यालय में सभी विद्यार्थी मेरे ज्ञान की प्रशंसा करें, मैं यदि ऑफिस में कार्य करता हूँ तो कार्यस्थल पर सभी मेरी प्रशंसा करें, मेरे रिश्तेदार-पड़ोसी मेरी तथा मेरे बच्चों की प्रशंसा करें, मैं जिस बस-ट्रेन-प्लेन आदि में भी यात्रा करूं वहां भी लोग मुझे बार बार मुड़कर देखें आदि लोकेष्णा के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिससे साधारण मनुष्य तो छोड़ दीजिए दूर से ज्ञानी और महान प्रतीत होने वाला मनुष्य भी सदा घिरा रहता है । ऐसे मनुष्यों का यदि बस चले तो वह मार्ग में चलती हुई चींटी को भी रोककर अपनी प्रशंसा के गीत सुनने के बाद ही उसे वहां से प्रस्थान करने दें ।

लोकेष्णा से भरे हुए मनुष्यों की आत्ममुग्धता की स्थिति इतनी विकराल हो चुकी है कि वह न तो यह देख पाते हैं और न ही समझ पाते हैं कि उनके आसपास के लोग अपना कार्य निकालने के लिए सामने से उनकी कितनी ही प्रशंसा करे लें किन्तु भीतर से उनको मूर्ख ही समझते हैं और पीठ पीछे उनकी निंदा करते हैं और जो विद्वान हैं, लोकेष्णा की स्थिति को समझते हैं, वह उनकी तुच्छ बुद्धि पर तरस खाते हैं ।

अतः देखा जाए तो लोकेष्णा की तृप्ति से घिरा मनुष्य अपने परलोक को तो कब का नष्ट कर ही चुका होता है अपने इस लोक को भी नष्ट कर रहा होता है क्यूंकि लोक में भी नाम और प्रसिद्धि अपने साथ विपत्ति ही लेकर आती है । ऐसे व्यक्ति के जितने मित्र नहीं होते उससे कहीं अधिक शत्रु होते हैं क्यूंकि उसके नाम और प्रसिद्धि के कारण उससे जलने वालों की संख्या बढ़ती ही जाती है । वह स्वयं को जिस समारोह की आभा समझ रहा होता है उसी समारोह में यदि ४ व्यक्ति उसके प्रशंसक होते हैं तो उससे कहीं अधिक उसके निंदक होते हैं ।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या भौतिक जगत में आगे बढ़ना, अपना कैरियर बनाना, अपनी सफलता के लिए कार्य करना आदि क्या यह सब व्यर्थ का कार्य है ?
इसका उत्तर है— नहीं ! भौतिक ऊंचाइयों को प्राप्त करना कोई अपराध नहीं है किन्तु अपने ही जैसे नाशवान मनुष्यों से सम्मान प्राप्त करने की लालसा रखना, अपनी वाहवाही लूटने के लिए नित्य नए-नए नाटक करना तथा अपनी आत्ममुग्धता के अंधे कुएं में अपनी आत्मा की वास्तविक स्थिति को खो देना महान मूर्खता है ।

मैं कुछ ऐसे लोगों को भी जानता हूँ जो स्वयं तो कभी अपने मुख से किसी की प्रशंसा नहीं करते, इसके विपरीत सभी से अपनी प्रशंसा सुनने के लिए दिन-रात एक किए रहते हैं । वास्तव में इनकी चेतना का स्तर तो पशुओं से भी अधिक गिरा हुआ होता है क्यूंकि पशु भी अपने को प्रेम करने वाले के प्रति अपना पूरा समर्पण व्यक्त करते हैं । उच्च कोटि की चेतना रखने वाले साधकजन ऐसे लोगों का उपहास नहीं उड़ाते इसके विपरीत वह केवल इनकी तुच्छ बुद्धि और अज्ञान पर तरस ही खाते हैं क्यूंकि ब्रह्मज्ञानी को कभी लोकेष्णा को शांत करने की भूख नहीं होती । न तो वह कभी किसी से प्रशंसा प्राप्त करने की कोई लालसा ही करता है और न ही वह कभी किसी से प्रशंसा प्राप्त होने पर प्रभावित होता है, इसके विपरीत वह तो सदा ईश्वर की भक्ति में स्वयं को आत्मस्वरूप मानकर अपना जीवन यापन करता है, सांसारिक मान-सम्मान की आकांक्षाओं से वह मोहित नहीं होता क्यूंकि वह जानता है कि "इस नाशवान संसार में अविनाशी तत्व यदि कोई है तो वह केवल और केवल 'चैतन्य परमात्मा' ही है और मनुष्य का नाम, पद, प्रसिद्धि आदि इस देह के छूटने के उपरान्त सब यहीं रह जाता है और उसके साथ जो जाता है वह होते हैं उसके शुभाशुभ कर्म ।

वह लोक-परलोक के इस रहस्य को भी जानता है कि जो मनुष्य इस भौतिक जगत में अपने भौतिक ज्ञान के कारण, अपने लेखन के कारण, अपने अभिनय और कला के कारण, अपने उच्च पद के कारण, बड़े राजनेता या राष्ट्रध्यक्ष होने के कारण, अपनी मृत्यु के उपरान्त भी आज तक सम्मान प्राप्त कर रहा है, हो सकता है कि वह अपने जीवनकाल में पापों की अधिकता होने से पारलौकिक जगत में अनंत काल के लिए घोर नर्कों में यातनाएं प्राप्त कर रहा हो ।

इसके विपरीत जो मनुष्य इस भौतिक जगत में कभी कोई पद-प्रसिद्धि प्राप्त न कर पाया हो , जिसका कहीं कोई नाम तक लेने वाला न हो, हो सकता है कि अपनी मृत्यु के उपरान्त अपने शुभ कर्मों के प्रभाव से वह अनन्त काल तक के लिए मृत्युलोक से दूर स्वर्ग में आनंद प्राप्त कर रहा हो ।

तत्वज्ञानी यह जानते हैं कि इस भौतिक जगत में प्राप्त इस नाम, प्रसिद्धि, प्रशंसा का पारलौकिक जगत में कोई महत्व नहीं है । हो सकता है कि भौतिक जगत में जिनकी प्रसिद्धि के कारण उनके पुतले बनाकर उन पर प्रतिदिन माला-पुष्प अर्पण किए जा रहे हों, वह पारलौकिक जगत में यमदूतों के हाथों पीटे जा रहे हों ।

इस सत्यता को समझने के पश्चात् उच्च स्तर की चेतना वाला तत्वज्ञानी इस झूठ से भरे हुए संसार से दूर भागने लगता है क्यूंकि वह जान चुका होता है कि यह समस्त संसार अपनी-अपनी लोकेष्णा की प्यास को शांत करने में लगा हुआ है । तत्वज्ञानी 'लोकेष्णा' की इस अंधी दौड़ से इसलिए भी दूर भाग जाना चाहता है क्यूंकि जिस प्रकार धन चले जाने पर परिवार नहीं रहता (क्षीणे वित्ते कः परिवारः) उसी प्रकार तत्त्वज्ञान होने के बाद संसार नहीं रहता (ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः) ।
ऐसे ही तत्वज्ञानियों के लिए भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं—
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।
अर्थात्
जिसके समस्त कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं ऐसे उस ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा भस्म हुये कर्मों वाले पुरुष को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।। (श्रीमद्भगवद्गीता–४.१९)


इसके विपरीत तत्वज्ञान के आभाव में जो मूर्ख हैं, अज्ञानी हैं, जिनकी चेतना शक्ति अत्यन्त निम्न स्तर की है और जो अपनी देह के होने का अहंकार नहीं त्याग सकते, वह इस लोकेष्णा के दलदल में कंठ तक धसे होते हुए भी स्वयं को एक ऐसे आवरण से ढके रहते हैं जो केवल उनके मिथ्या अहंकार की सूक्ष्म परतों से बना हुआ होता है । ऐसे उन देहाभिमानियों से मुझे केवल इतना ही कहना है कि इस अंधी लोकेष्णा के दलदल से यदि तुम अब भी बाहर न निकले तो संभवतः भगवान् के पास भी तुम्हारी मुक्ति का कोई विधान नहीं है ।

"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2023

ग्रहों का राशि परिवर्तन और चन्द्र ग्रहण २०२३



 ब्रह्माण्ड में शीघ्र ही कुछ बड़े परिवर्तन होने जा रहे हैं—

३० अक्टूबर को राहु-केतु के राशि परिवर्तन के साथ ही देव गुरु बृहस्पति पर अब तक बना हुआ चांडाल योग भंग हो जाएगा ।

अति विध्वंसकारी मंगल-केतु योग जिसकी जानकारी मैंने आपको अपने पिछले ब्लॉग के माध्यम से उपलब्ध करवाई थी, यह विध्वंसकारी योग भी केतु के राशि परिवर्तन करने के साथ ही समाप्त हो जाएगा ।

४ नवंबर को शनि भी वक्री अवस्था छोड़ कर मार्गी अवस्था प्राप्त कर लेंगे और १७ नवम्बर को सूर्य भी अपनी नीच राशि से निकलकर अपने सेनापति मंगल की राशि में संचार करने लगेंगे जिससे विश्व और अधिकांश जनमानस को उनके कष्टों से मुक्ति प्राप्त होगी ।

यद्यपि ३ नवम्बर को शुक्र अपनी नीच राशि में संचार करने लगेंगे जिसके कारण विश्व भर में स्त्रियों को कुछ कष्ट अवश्य होगा किन्तु शुक्र के इस राशि परिवर्तन की अवधि अत्यन्त अल्पकाल की होने के कारण वह उतनी हानि नहीं कर सकेंगे ।

२८–२९ अक्तूबर, शरद पूर्णिमा की रात्रि में खण्डग्रास चन्द्र ग्रहण होगा जो कि सम्पूर्ण भारत में दृश्य होगा अतः सभी स्थानों पर सूतक भी मान्य होंगे । भारत में इसका स्पर्श– रात्रि १ बजकर ५ मिनट पर, मध्य– १ बजकर ४४ मिनट पर तथा समाप्त–२ बजकर २२ मिनट पर होगा । इस प्रकार से इसका पर्व काल १ घंटा १७ मिनट का होगा । चन्द्र ग्रहण में ९ घंटे पूर्व से सूतक लगते हैं, भारत के जिस नगर में जिस समय चन्द्र ग्रहण दिखाई देगा वहां उसके सूतक भी उसके ९ घंटे पूर्व से ही मान्य होंगे ।

यह ग्रहण 'मेष राशि के अश्वनी' नक्षत्र में लगेगा जो कि 'केतु' का नक्षत्र होता है । केतु तन्त्र साधक को उसकी साधना में गहराई तक ले जाने वाला ग्रह होता है अतः इस चन्द्र ग्रहण में १ घंटा १७ मिनट का यह पर्वकाल तन्त्र साधकों को विशेष सिद्धि प्राप्त करवाने वाला होगा । चन्द्र ग्रहण के इस विशेष अवसर पर जो साधक जिस साधना में अधिकृत है उसको उसके अधिकार की सीमा में आने वाले मंत्र को अवश्य सिद्ध कर लेना चाहिए क्योंकि चन्द्र ग्रहण में मंत्र, दान, यज्ञ आदि करने का प्रभाव सामान्य से ९०० गुना अधिक होता है जिससे कोई भी मंत्र ग्रहण के समय अल्पकाल में ही सिद्ध हो जाता है, एक बार मंत्र सिद्ध हो जाने पर प्रतिदिन उस मंत्र का जप करते रहने से उस मंत्र की सिद्धि का प्रभाव जीवन पर्यन्त उस साधक के साथ बना रहता है ।

यह चंद्र ग्रहण एशिया, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, नॉर्थ अमेरिका, साउथ अमेरिका के अधिकतर भाग तथा हिन्द महासागर, प्रशान्त महासगर, अटलांटिक, आर्कटिक अंटार्कटिका में दिखाई देगा । ईरान, अफगानिस्तान, तुर्की, चीन, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, अमेरिका के अलास्का,कोडरिंगटन, एंटीगुआ बारबुडा तथा कैलिफोर्निया की जनता को आगामी तीन माह तक भूकंप के प्रति सावधान रहना चाहिए ।

शरद पूर्णिमा पर पड़ने वाला यह चन्द्र ग्रहण अपने गुरूत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) के अनियंत्रित हो जाने से समुद्र से घिरे स्थानों में आगामी तीन माह तक सुनामी, चक्रवात और भूकम्प आदि लाकर बहुत अधिक विनाश करने वाला है । 

चन्द्र ग्रहण के इन अमंगलकारी परिणामों के पश्चात् भी विश्व के लिए सबसे अधिक शान्ति देने वाली बात यह है कि पिछले डेढ़ वर्ष से 'मेष' राशि में संचार कर रहे 'राहु' ने विश्व भर में जितना तांडव मचाया है ३० अक्टूबर के पश्चात् उसमें अब भारी कमी आयेगी क्योंकि ३० अक्टूबर से राहु द्वारा देव गुरु बृहस्पति की राशि 'मीन' में संचार करने से राहु के भीतर देव गुरु बृहस्पति के तत्व भी जाग्रत होने लगेंगे जिससे राहु की चांडाल प्रवृत्ति में आगामी डेढ़ वर्षों के लिए बहुत अधिक विनम्रता आयेगी (राहु-केतु जिस ग्रह के साथ बैठते हैं तथा जिस ग्रह की राशि में बैठते हैं, उसकी छाया ग्रहण करके उसके जैसे फल भी देने लगते हैं) ।

राहु द्वारा गुरु की शुभता प्राप्त कर लेने के पश्चात् भी मैं जिस बात को यहां लिखने जा रहा हूँ हो सकता है वह कुछ व्यक्तियों को अटपटी लगे क्योंकि विश्व में आज से पूर्व किसी भी ज्योतिष के विद्वान ने प्रकट रूप से यह बात नहीं कही होगी परन्तु सत्य जैसा भी हो वह तो मुझे लिखना ही होगा ।

राहु द्वारा जलीय राशि 'मीन' में संचार करने से आगामी डेढ़ वर्ष तक समुद्र तल के नीचे पाताल लोक में निवास करने वाले पातालवासी (असुर,दैत्य,नाग आदि) राहु की शक्ति से नवीन ऊर्जा प्राप्त कर लेंगे । ईश्वरीय नियम में बंधे होने के कारण वह भले ही पृथ्वी लोक पर विचरण करने न आएं किन्तु जल में डूबकर मृत्यु को प्राप्त होने वाले मनुष्यों को जल-प्रेत बनाने का कार्य वह अवश्य करेंगे और पाताल लोक के इन असुरों द्वारा शक्ति प्राप्त करके मनुष्य से जल-प्रेत बने यह लोग आगामी डेढ़ वर्षों तक दूसरे मनुष्यों को जल में डुबोकर मारने का प्रयास करेंगे जिसके कारण आगामी डेढ़ वर्षों में विश्व भर में जल में डूबकर मरने वालों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि देखी जाएगी तथा समुद्र और नदियों में विचरण करने वाले विषैले सर्प डेढ़ वर्ष के इस अवधिकाल में बहुत से जीवों की मृत्यु का कारण बनेंगे ।
कलौ चंडी 'विनायकौ' के सिद्धांत को समझते हुए भगवती दुर्गा और जल तत्व के देवता भगवान् श्री गणेश की उच्च कोटि की साधना के प्रभाव से मनुष्यों के सभी कष्टों का निवारण होगा ।
"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava

गुरुवार, 24 अगस्त 2023

प्रेम-वियोग और अध्यात्म


अपने Professional Astrology के कैरियर में अब तक मेरे पास हजारों ऐसी जन्मकुंडलियां आ चुकी हैं जिसमें प्रेम संबंधों में वियोग हो जाने से सच्चा प्रेम करने वाले स्त्री-पुरुष आन्तरिक रूप से इतना टूट जाते हैं कि अपने जीवन जीने की समस्त इच्छा ही समाप्त कर लेते हैं । यदि प्रेम दोनों ही ओर से हो तब तो ठीक है किन्तु यदि एक व्यक्ति प्रेम करता है और दूसरा उसके साथ प्रेम करने का अभिनय कर रहा है तो ऐसे में सच्चा प्रेम करने वाला व्यक्ति अपने साथ हुए इस छल को सह नहीं पाता और स्वयं को चारों ओर से घोर मानसिक दुःख से घेर लेता है । उसे किसी से बात करना, मिलना-जुलना नहीं भाता क्योंकि उसे लगता है कि कोई भी दूसरा उसके विरह के दुःख को समझ नहीं पा रहा है (अपने प्रेमी-प्रेमिका के साथ बिताए गए अच्छे पलों के बार-बार स्मरण होने तथा भविष्य में कभी उन पलों को पुनः न जी सकने का दुःख) ।


प्रेम-वियोग जैसे महान 'सांसारिक दुःख' में डूबकर प्रतिदिन स्वयं तथा अपने परिवारजनों को घोर कष्ट दे रहे ऐसे स्त्री-पुरुषों, जिन पर कोई धर्म गुरु ध्यान नहीं देता, ऐसे उन भाई-बहनों को उनके उस दुःख से बाहर निकालने के लिए मैं यह ब्लॉग लिखने जा रहा हूँ । यद्यपि मैं यह जानता हूँ कि विरह की अग्नि से बड़े-बड़े ऋषि मुनि और राजा-महाराजा तो क्या स्वयं भगवान् (लीलावश) भी नहीं बच सकें हैं तथापि अपने आराध्य भगवान् शंकर से मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि वह मेरे इस ब्लॉग को यह आशीर्वाद प्रदान करें कि इस ब्लॉग को पढ़ने वाले मेरे सनातनी भाई-बहन न केवल प्रेम-वियोग की पीड़ा से बाहर निकलें अपितु वह सदा धर्म युक्त आचरण करने वाले धर्म-परायण सनातनी बनें ।

किसी भी जातक की जन्म कुंडली का 'पंचम भाव, 'पंचम भाव का अधिपति' (पंचमेश)' और प्रेम संबंधों का कारक ग्रह 'शुक्र' (भाव,स्वामी,कारक) उसके जीवन में बनने वाले प्रेम संबंधों को प्रदर्शित करते हैं तथा 'पंचम से पंचम' होने से 'नवम भाव' (भावात् भावम्) भी इस विषय में महत्वपूर्ण भाव हो जाता है।

ऐसे में यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में पंचम भाव, पंचमेश, नवम भाव, नवमेश तथा कारक शुक्र शुभ स्थिति में हैं तो उस व्यक्ति के जीवन में कभी प्रेम की कमी नहीं रहती । इसके विपरीत यदि किसी जातक की जन्मकुंडली में यह सभी अथवा इनमें से कुछ एक-दो पीड़ित हैं, पाप प्रभाव में हैं, अपनी नीच राशि या शत्रु राशि में स्थित हैं तो ऐसा जातक जीवन भर अपना प्रेम प्राप्त करने के लिए संघर्ष करता रहता है । वह किसी को कितना ही प्रभावित करने का प्रयास कर ले किन्तु कोई उसकी ओर ध्यान नहीं देता ।

इधर यदि किसी जातक की कुंडली में पंचम भाव, पंचमेश, नवम भाव, नवमेश और कारक शुक्र शुभ स्थिति में हों और गोचर में उसकी जन्म कुंडली का पंचमेश ६,८,१२ भाव में चला जाए अथवा गोचर में पंचम भाव पर राहु, केतु, शनि, सूर्य, मंगल जैसे पृथकतावादी ग्रहों का संचार हो जाए तथा गोचर में ही प्रेम संबंधों का कारक शुक्र अपनी नीच अथवा शत्रु राशि में चला जाए या पाप ग्रहों के प्रभाव से पीड़ित अथवा सूर्य से अस्त हो जाए तब भी कुछ समय के लिए उसके प्रेम संबंधों में कड़वाहट आ जाती है जो कि अनेक बार इतनी अधिक हो जाती है कि वह स्वयं को अपने प्रेम संबंध से पृथक कर लेता है भले ही उसको इससे कितनी ही पीड़ा और दुःख उठाना पड़े ।

इस प्रकार यदि ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से देखा जाए तो किसी भी जातक के जीवन में प्रेम संबंधों में सदैव मधुरता रह पाना संभव नहीं है । कभी न कभी तो यह पृथकतावादी प्रभाव उसके प्रेम संबंधों पर पड़ेगा ही । यही वह संक्रमण काल होता है जिसमें स्त्री-पुरुष स्वयं ही अपने प्रेम संबंधों को विच्छेद कर किसी दूसरे व्यक्ति से प्रेम प्राप्ति की अभिलाषा लिए आगे बढ़ जाते हैं और पीछे छोड़ जाते हैं अपने प्रेम के वियोग में डूबी हुई अपनी ही जैसी एक दूसरी जीवात्मा को, जिसकी अश्रुधाराओं से बनता है वह 'संचित कर्म' जिससे उत्पन्न 'प्रारब्ध' को भोगने के लिए उन्हें पुनर्जन्म लेना पड़ता है और पुनर्जन्म लेकर उनको भी अपने अगले जन्म में प्रेम-वियोग का वही दुःख सहन करना पड़ता है जो वह अपने इस जन्म में किसी और को दे रहा है क्योंकि संचित कर्म से उत्पन्न हुए प्रारब्ध का फल तो भोगना ही पड़ता है, यही ईश्वरीय विधान है ।

'संचित' का अर्थ होता है संचय (एकत्रित) किया हुआ, अतएव हमारे अनेक पूर्व जन्मों से लेकर वर्तमान में किए गए कर्मों के संचय को 'संचित कर्म' कहते हैं । इस प्रकार से संचित कर्म हमारे द्वारा अनेक जन्मों में किए गए पाप-पुण्यों का संग्रह है । इन्हीं संचित कर्मों में से कुछ अंश-मात्र कर्मों के फल को जो हमें इस जन्म में भोगना है उसे हमारा 'प्रारब्ध' कहा जाता है, दूसरे शब्दों में इसे हमारा 'भाग्य' भी कहते हैं अर्थात् यदि सरल शब्दों में कहा जाए तो जो कुछ भी शुभ-अशुभ घटनाएं हमारे जीवन में घटित होती हैं और जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता उसी को हमारा 'प्रारब्ध' कहते हैं ।

अनेक बार दुःख प्राप्त होने पर हम ईश्वर को कोसने लगते हैं और कहते हैं कि भगवान् ! हमने तो अपने इस जन्म में ऐसा कोई पाप नहीं किया जो हमें यह दुःख उठाना पड़ रहा है किन्तु ऐसा कहते समय हम यह भूल जाते हैं कि हम केवल अपने इस जन्म को देख रहे होते हैं किन्तु इस चराचर जगत को बनाने वाले सर्वशक्तिमान ईश्वर हमारे अनेक जन्मों को भी जानते हैं ।

श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण, परम् धर्मात्मा अर्जुन को पुनर्जन्म के विषय में संकेत देते हुए यह कहते हैं—
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।४.५।।
अर्थात्
हे परन्तप अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, पर तू नहीं जानता ।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।४.९।।
अर्थात्
हे अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है,  इस प्रकार जो पुरुष तत्व से जान लेता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता;  वह मुझे ही प्राप्त होता है ।।

अपने संचित कर्मों को नष्ट करके हमें किस प्रकार से प्रारब्ध शून्य बनना है यह समझाते हुए आगे के श्लोक में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं—
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।४.३७।।
अर्थात्
जैसे प्रज्जवलित अग्नि ईन्धन को भस्मसात् कर देती है,  वैसे ही, हे अर्जुन ! ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्मसात् कर देती है।।

अतः मेरा उन सभी सनातनी भाई-बहनों से विनम्र निवेदन है कि वह इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए इस बात को समझें कि प्रेम वियोग रूपी जो दुःख वह आज भोग रहे हैं संभवतः वह उनके द्वारा पूर्व जन्म में किए गए किसी पाप कर्म का कोई फल है जो उन्हें यह भयानक मानसिक पीड़ा और दुःख देकर अंततः उनकी आत्मा को शुद्ध करने में सहायता ही कर रहा है तथा आप सभी इस बात को जानकर भी अपने मन की पीड़ा और क्रोध को शान्त कर सकते हैं कि इस जन्म में आपके साथ जो छल करके स्वयं को अत्यधिक चतुर समझ रहा है उसको भी पुनर्जन्म लेकर अपने संचित कर्मों का भुगतान तो करना ही पड़ेगा । यही नहीं, अनेक बार तो प्रारब्ध की स्थिति इतनी विकट होती है कि उसको इसी जन्म में निकट भविष्य में ही अपने द्वारा किए गए इस पाप कर्म का भुगतान करना पड़ जाता है । अतः इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए भी आप में से किसी को अपने लिए शोक नहीं करना चाहिए ।

किसी के वियोग में शोक न करने का यह अत्यन्त तुच्छ और सांसारिक कारण है जो कि यहां लिखना इसलिए आवश्यक था क्योंकि मैं जानता हूँ कि प्रत्येक मनुष्य की चेतना शक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है, जिसमें से उच्च स्तर की चेतना शक्ति वाले मनुष्य प्रेम में स्वयं से छल करने वाले दूसरे मनुष्यों को स्वयं के पाप कर्मों के फलों का भुगतान करवाने वाला एक निमित्त मात्र मानकर क्षमा कर देते हैं तो कुछ मध्यम व निम्न स्तर की चेतना शक्ति वाले मनुष्य इस छल को सह नहीं पाते और निरन्तर उसके विनाश की कामना करते रहते हैं, इनमें से सभी अपने-अपने स्थानों पर सही हैं क्योंकि जिसके साथ छल किया जाता है उसकी पीड़ा बस वही समझ सकता है, हम यहां बैठकर उसका आंकलन भी नहीं कर सकते हैं ।

अब बात करते हैं कि प्रेम वियोग रूपी इस दुःख को मिटाने में अध्यात्म की क्या भूमिका है ?
तो जीव के अज्ञान का कारण उसकी देहात्मबुद्धि है । यह देह भौतिक है और मैं आत्म स्वरूप हूं जिसने यह देह धारण की हुई है, इसी समझ का नाम ही आत्म-ज्ञान है । दुर्भाग्यवश सांसारिक मोहवश जो जीव अज्ञान में रहता है, वह देह को ही आत्मा मान लेता है । उसे जीवन भर यह ज्ञात ही नहीं हो पाता कि देह पदार्थ-स्वरूप है । ये देहें बालू के छोटे-छोटे कणों के समान एक दूसरे के निकट आती और पुन: कालवेग से पृथक् हो जाती हैं जीव व्यर्थ ही संयोग या वियोग के लिए शोक करते हैं । इस विषय पर श्रीमद् भागवत का यह श्लोक देखिए...
यथा प्रयान्ति संयान्ति स्रोतोवेगेन बालुका: ।
संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते तथा कालेन देहिन: ॥ ६.१५.३॥
अर्थात्—
जिस प्रकार बालू के छोटे-छोटे कण लहरों के वेग से कभी एक दूसरे के निकट आते हैं और कभी विलग हो जाते हैं, उसी प्रकार से देहधारी जीवात्माएँ काल के वेग से कभी मिलती हैं, तो कभी बिछुड़ जाती हैं । 

अतः इस उच्च कोटि के आध्यात्मिक ज्ञान को जानने के पश्चात् भी यदि कोई प्रेम वियोग से शोकाकुल है तो उसके लिए मैं यहां एक ही बात कहूंगा कि आपमें से कोई भी प्रेम संबंधों में विफलता के लिए इसलिए भी शोक न करे क्योंकि आपके साथ यदि कोई छल करके गया है अथवा ग्रहों और काल के प्रभाव से पृथक हो गया है तो वह आपके प्रेम रूपी ऋण को उतारने के लिए पुनः जीव देह धारण करके आपके सम्मुख आने के लिए विवश किया जाएगा। यही ईश्वरीय विधान है और न्याय भी। अतः आपको कभी भी किसी के लिए भी शोक नहीं करना चाहिए और सदैव धर्म की ही शरण में रहना चाहिए क्योंकि सदा धर्म की शरण में रहने वालों का कभी नाश नहीं होता ।
"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava