बहुत समय पहले की बात है, एक व्यक्ति के दो पुत्र थे । वह उन दोनों की जन्मकुंडली लेकर एक अधकचरे ज्योतिषी के पास गया । उस अधकचरे ज्योतिषी को ज्योतिष शास्त्र का जितना ज्ञान था उसके आधार पर उसने उस व्यक्ति के उन दोनों पुत्रों की जन्मकुंडलियों का विश्लेषण करके यह भविष्यवाणी की— "तुम्हारा छोटा पुत्र ही तुम्हारी सेवा करेगा न कि ज्येष्ठ पुत्र ।"
Translate
शनिवार, 13 दिसंबर 2025
कुपात्र के हाथों में ज्योतिष शास्त्र के जाने के दुष्परिणाम" —
शनिवार, 6 सितंबर 2025
चन्द्रग्रहण सितम्बर २०२५
७ सितम्बर २०२५ को चन्द्रग्रहण लगने जा रहा है जो भारत में भी दृष्टिगोचर होगा, इस कारण से भारत में इसके सूतक मान्य होंगे तथा सभी जातकों पर इसका भौतिक व आध्यात्मिक प्रभाव पड़ेगा । यह चन्द्रग्रहण, शनि की राशि 'कुंभ' और बृहस्पति के नक्षत्र 'पूर्वभाद्रपद' में लगेगा ।
आप सभी के लिए ग्रहण सम्बन्धित कुछ विशेष जानकारियां यहां उपलब्ध करवाने जा रहा हूँ —
ग्रहण के सूतक लगने से पूर्व ही घर के मंदिरों में स्थित यंत्र-कवच तथा गले या हाथ में बंधे हुए अभिमंत्रित किए हुए गंडे-कवच आदि उतार कर उन्हें कुशा के भीतर छुपा कर रख देना चाहिए तथा अगले दिन सूर्योदय के पश्चात् गंगाजल आदि से धोकर उन्हें अपने-अपने स्थानों पर पुनः प्रतिष्ठित करना चाहिए ।
घर के मंदिरों को भी सूतक लगने से पूर्व किसी मोटे वस्त्र आदि से ढक देना चाहिए और जब ग्रहण समाप्त हो जाए तो मूर्तियों को कुशा मिश्रित गंगाजल से स्नान करवाना चाहिए । यदि किसी के यहां मूर्ति न होकर चित्र हों तो उन पर इस कुशायुक्त जल के छींटे मारने चाहिए ।
जब ग्रहण समाप्त हो जाए तो घर की धुलाई-सफाई तो आप सभी करते ही हैं परन्तु कुछ लोग ग्रहण समाप्त होते ही भोजन कर लेते हैं जबकि भोजन उन्हें आगामी दिन के सूर्योदय के उपरान्त ही करना चाहिए ।
सूतकों में पूजा पाठ, अधिक कोलाहल, मूर्ति स्पर्श, भोजन, शयन आदि का निषेध है । इस समय पृथ्वी अधिक संवेदनशील हो जाती है और यदि अधिक कोलाहल किया जाए तो ब्रह्म चेतना कुपित होकर जीव को दंड दे देती है तथा हानिकारक जीवाणुओं एवं विषाणुओं की संख्या में अत्यधिक वृद्धि होने से घर के साथ-साथ वहां रखें भोज्य पदार्थ इत्यादि भी दूषित हो जाते हैं, ऐसे में ग्रहण समाप्त हो जाने के बाद गंगाजल - गोमूत्र से घर की शुद्धि करके अगले दिन सूर्योदय के पश्चात् नया बनाया गया भोजन ही ग्रहण करना चाहिए ।
सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक 'अरुन्तुद' नरक में वास करता है । सूर्यग्रहण में ग्रहण चार प्रहर (१२ घंटे) पूर्व और चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर (९ घंटे) पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए । बच्चे, वृद्ध और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं ।
ग्रहण के स्पर्श के समय स्नान, मध्य के समय होम, देव-पूजन और अंत में सचैल (वस्त्रसहित) स्नान तथा दान करना चाहिए । ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए तथा स्वयं भी वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए ।
ग्रहण के स्नान में कोई मंत्र नहीं बोलना चाहिए । ग्रहण के स्नान में गरम जल की अपेक्षा ठंडा जल, ठंडे जल में भी दूसरे के हाथ से निकाले हुए जल की अपेक्षा अपने हाथ से निकाला हुआ, निकाले हुए की अपेक्षा भूमि में भरा हुआ, भरे हुए की अपेक्षा बहता हुआ, बहते हुए की अपेक्षा सरोवर का, सरोवर की अपेक्षा नदी का, अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा का और गंगा की अपेक्षा भी समुद्र का जल पवित्र माना जाता है ।
ग्रहण के अंत में गायों को घास , पक्षियों को अन्न, चींटियों को भोजन, ब्राह्मणों को वस्त्र, अन्न तथा दक्षिणा आदि का दान करने से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है ।
ग्रहण के समय कोई भी शुभ व नया कार्य आरंभ नहीं करना चाहिए । ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है । गर्भवती स्त्रियों को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए ।
भगवान् वेदव्यासजी ने परम् हितकारी वचन कहे हैं— 'सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्यग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है । यदि गंगाजल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है ।
ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। (स्कन्द पुराण), भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिए। (देवी भागवत), अस्त के समय सूर्य और चन्द्रमा को रोगभय के कारण नहीं देखना चाहिए। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्णजन्म खं. ७५.२४)
ग्रहण का स्पर्श होते ही उसके सूतक समाप्त हो जाते हैं और मंत्र जप, स्तोत्र पाठ आदि करने का समय आरंभ हो जाता है । ग्रहणकाल और सूतक में यही भेद होता है कि सूतक काल में पूजा-पाठ वर्जित होता है जबकि ग्रहणकाल साधना के लिए सर्वोत्तम समय होता है । ग्रहणकाल में साधना पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके ही करनी चाहिए ।
गर्दन तक जल में खड़े होकर यदि कोई मंत्र साधना करता है तो उसका फल अमोघ होता है, यह कार्य किसी नदी तीर्थ आदि पर हो तो और भी उत्तम होता है, ऐसे में तीर्थ स्थल के अभाव में कुछ साधक अपने घरों में जल की टंकी में जल भरकर रख लेते हैं तथा उसमें गर्दन तक खड़े होकर मंत्र का जप करते हैं, यह बहुत ही उत्तम कार्य है । विद्वान मनुष्यों को ऐसा ही करना चाहिए ।
ग्रहण काल में देवी-देवताओं द्वारा पृथ्वी पर भेजी जाने वाली शक्तियां क्षीण पड़ जाती हैं और चारों ओर नकारात्मक ऊर्जाओं का दुष्प्रभाव फैल जाता है, ऐसे में जो मनुष्य देवी-देवताओं के मंत्र का जप इत्यादि करता है, इससे उस मंत्र से सम्बंधित देवी-देवताओं की बाधित ऊर्जा सीधे उस मनुष्य से अत्यन्त तीव्रता के साथ जुड़ने लगती है । यही कारण है कि किसी भी अन्य काल की अपेक्षाकृत ग्रहण काल में मंत्र बहुत तीव्रता और शीघ्रता से सिद्ध हो जाता है ।
ग्रहण काल में राहु-केतु के मंत्र जप करने से बचना चाहिए क्योंकि उन्हीं की शक्तियों के कारण देव शक्तियों को कष्ट प्राप्त हो रहा होता है, ऐसे में हमें राहु-केतु के मंत्रों का जप करके उनकी शक्तियां नहीं बढ़ानी चाहिए तथा उसके स्थान पर उनके अधिष्ठात्री देवी-देवता, भगवती दुर्गा तथा भगवान् शंकर के मंत्रों का जप करना चाहिए ।
एक बार मंत्र सिद्धि हो जाने पर वह मंत्र जपना छोड़ना नहीं चाहिए, ग्रहण काल में सिद्ध किए हुए मंत्र का जितना अधिक जप किया जाता है , उस मंत्र के फल देने की क्षमता उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है ।
जो साधक किसी परम्परा प्राप्त गुरु द्वारा दीक्षित नहीं हैं, उन्हें मंत्रों का जप करने के स्थान पर उच्च कोटि के देवी–देवताओं के शक्तिशाली स्त्रोतों का संस्कृत में पाठ करना चाहिए । जिन्हें संस्कृत नहीं आती वह सुंदरकांड अथवा हनुमान चालीसा आदि का पाठ करके उसे अपने लिए सिद्ध कर सकते हैं ।
स्मरण रहे कि जो साधक जिस साधना में अधिकृत है, वह अपने अधिकार की सीमा में आने वाले मंत्रों का अनुष्ठान करके ही सिद्धि अथवा मुक्ति प्राप्त कर सकता है । अपने अधिकार की सीमा का अतिक्रमण करके इधर-उधर से प्राप्त किया हुआ मंत्र उस अनधिकृत व्यक्ति का उत्थान करने के स्थान पर उल्टा विनाश ही करता है । अतः किसी भी प्रकार के प्रमाद में न पड़कर शास्त्रों में वर्णित अपने अधिकार की सीमा में आने वाले मंत्रों का ही जप करें ।
मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखने वाले वेदपाठी ब्राह्मणों को ग्रहणकाल में शाबर मंत्रों को सिद्ध करने से बचना चाहिए तथा उसके स्थान पर गायत्री-महामृत्युंजय-श्रीविद्या-दस महाविद्या जैसी उच्च कोटि की विद्याओं के मंत्रों को सिद्ध करने का प्रयास करना चाहिए ।
विशेष— इस चन्द्रग्रहण के प्रभाव से विश्वभर में आगामी डेढ़ माह तक विभिन्न स्थानों पर शक्तिशाली भूकंप तथा सुनामी आने का भय बना रहेगा । बृहस्पति के नक्षत्र पर ग्रहण लगने के कारण आगामी डेढ़ माह के भीतर किसी बड़े धर्मगुरु की मृत्यु अथवा मृत्यु तुल्य कष्ट का समाचार प्राप्त होगा ।
गुरुवार, 14 अगस्त 2025
पशुपालन और धर्म
"भौतिक सर्वोच्च न्यायालय" द्वारा कुत्तों से सम्बंधित विषय में निर्णय आने के पश्चात् समूचे भारत में कुत्ता प्रेमियों तथा विरोधियों के मध्य विवाद बढ़ गया है । इस विषय में धर्म शास्त्र क्या कहते हैं ? आइए जानते हैं—
गुरुवार, 6 मार्च 2025
पिशाच योग (शनि-राहु युति २०२५)
यदि और अधिक सरल शब्दों में कहूं तो शनि-राहु की युति के इस अवधिकाल को ईश्वर की शरण में रहकर शान्ति के साथ निकालने की आवश्यकता है क्योंकि मीन राशि में होने जा रही इस युति के कारण अब तक वहां संचार कर रहे उच्च के शुक्र भी अपनी शुभता को खो देंगे तथा वह विभिन्न जातकों के जिस-जिस भाव के स्वामी व कारक होंगे वहां से सम्बन्धित पदार्थों की हानि करने लगेंगे ।
नोट—
[ ] शनि के राशि परिवर्तन कर लेने के साथ ही कुछ जातकों की ढैया-साढ़े साती समाप्त, तो कुछ की आरम्भ होगी किन्तु यह इस ब्लॉग का विषय न होने से इस विषय में यहां जानकारी नहीं दे रहा हूँ । यदि संभव हुआ तो उसके लिए अलग से एक ब्लॉग लिख दूंगा ।
[ ] ज्योतिष शास्त्र में श्रद्धा रखने वाले विद्वान मनुष्यों को २९ मार्च से लेकर १८ मई तक अपने बच्चों की डिलीवरी करवाने से बचना चाहिए । यदि संभव हो सके तो २९ मार्च से पूर्व (शनि-राहु युति बनने से पूर्व) अथवा ६ जून के पश्चात् (मंगल के नीच राशि में संचार करने के कारण) ही बच्चों की डिलीवरी हो अन्यथा उनकी जन्म-कुंडली में जीवनभर के लिए शनि-राहु की युति तथा नीच राशि के मंगल की स्थिति बन जाएगी, जो कि बहुत कष्टकारी सिद्ध होगी ।
"शिवार्पणमस्तु"
—Astrologer Manu Bhargava
मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024
सनातन धर्म की आन्तरिक चुनौतियां भाग—३
शनिवार, 22 जून 2024
लोकेष्णा
अज्ञान के अंधकार से व्याप्त मनुष्य की बुद्धि और मन सदा तीन प्रकार की तृष्णाओं से घिरा रहता है ।
गुरुवार, 26 अक्टूबर 2023
ग्रहों का राशि परिवर्तन और चन्द्र ग्रहण २०२३
—Astrologer Manu Bhargava
गुरुवार, 24 अगस्त 2023
प्रेम-वियोग और अध्यात्म
अपने Professional Astrology के कैरियर में अब तक मेरे पास हजारों ऐसी जन्मकुंडलियां आ चुकी हैं जिसमें प्रेम संबंधों में वियोग हो जाने से सच्चा प्रेम करने वाले स्त्री-पुरुष आन्तरिक रूप से इतना टूट जाते हैं कि अपने जीवन जीने की समस्त इच्छा ही समाप्त कर लेते हैं । यदि प्रेम दोनों ही ओर से हो तब तो ठीक है किन्तु यदि एक व्यक्ति प्रेम करता है और दूसरा उसके साथ प्रेम करने का अभिनय कर रहा है तो ऐसे में सच्चा प्रेम करने वाला व्यक्ति अपने साथ हुए इस छल को सह नहीं पाता और स्वयं को चारों ओर से घोर मानसिक दुःख से घेर लेता है । उसे किसी से बात करना, मिलना-जुलना नहीं भाता क्योंकि उसे लगता है कि कोई भी दूसरा उसके विरह के दुःख को समझ नहीं पा रहा है (अपने प्रेमी-प्रेमिका के साथ बिताए गए अच्छे पलों के बार-बार स्मरण होने तथा भविष्य में कभी उन पलों को पुनः न जी सकने का दुःख) ।













