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गुरुवार, 14 अगस्त 2025

पशुपालन और धर्म

 "भौतिक सर्वोच्च न्यायालय" द्वारा कुत्तों से सम्बंधित विषय में निर्णय आने के पश्चात् समूचे भारत में कुत्ता प्रेमियों तथा विरोधियों के मध्य विवाद बढ़ गया है । इस विषय में धर्म शास्त्र क्या कहते हैं ? आइए जानते हैं—


पशुपालन सम्बन्धी धर्मशास्त्रीय नियम—
मार्जारकुक्कुटच्छागश्ववराहविहङ्गमान्।
पोषयन्नरकं याति तमेव द्विजसत्तम॥ (विष्णुपुराण २।६।२१; ब्रह्मपुराण २२ । २०)

कुक्कुटश्वानमार्जारान् पोषयन्ति दिनत्रयम्।
इह जन्मनि शूद्रत्वं मृतः श्वा चाभिजायते॥ (वाधूलस्मृति १७०)
बिल्ली, मुर्गा, बकरा, कुत्ता, सूअर तथा पक्षियों को पालने वाला मनुष्य नरक (कृमिपूय या पूयवह) में गिरता है।

स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति धिष्ण्यमिष्टापूर्त क्रोधवशा हरन्ति।
ततो विचार्य क्रियतां धर्मराज त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति।। (महाभारत, महाप्रस्थानिक० ३।१०)
कुत्ता रखने वालों के लिये स्वर्ग लोक में स्थान नहीं है । उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवाने का जो पुण्य होता है, उसे 'क्रोधवश' नामक राक्षस हर लेते हैं ।


कुक्कुटे शुनके चैव हविर्नाश्नन्ति देवताः। (महाभारत, अनु० १२७।१६)
घर में मुर्गे और कुत्ते के रहने पर देवता उस घर में हविष्य ग्रहण नहीं करते ।
    

चाण्डालश्च वराहश्च कुक्कुटः श्वा तथैव च।
रजस्वला च षण्डश्च नेक्षेरन्नश्नतो द्विजान्॥
होमे प्रदाने भोज्ये च यदेभिरभिवीक्ष्यते।
दैवे हविषि पित्र्ये वा तद्गच्छत्ययथातथम्॥ (मनुस्मृति ३। २३९-२४०)
यदि कुत्ते, सूअर और मुर्गे की दृष्टि पड़ जाय तो देवपूजन, श्राद्ध- तर्पण, ब्राह्मण-भोजन, दान और होम-ये सब निष्फल हो जाते हैं।

मार्जारश्च   गृहे  यस्य  सोऽप्यन्त्यजसमो  नरः ।
  भोजयेद्यस्तु विप्रेन्द्रान् मार्जारान् सन्निधौ यदि ।।
   तच्चाण्डालसमं  ज्ञेयं  नात्र कार्या  विचारणा ।।
जिस घर में बिल्ली रहती है वह चाण्डाल के समान होता है । यदि कोई मनुष्य बिल्ली की सन्निधि में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराता है - तो उसे चाण्डाल के समान जानना चाहिए ।

अजाश्वानखरोष्ट्राणां मार्जनात्तुषरेणुकान् ।
   संस्पृशेद्यदि मूढात्मा श्रियं हन्ति हरेरपि ।। "
यदि कोई मूढ बुद्धिवाला (मनुष्य ) बकरी - कुत्ता - गधा - ऊंट आदि से उठी हुई धूल अथवा झाडू लगाने से उठी हुई धूल का स्पर्श करता है—तो उसकी लक्ष्मी नष्ट हो जाती है, फिर चाहे वह विष्णु ही क्यों न हों।


  गावो देवाः सदा रक्ष्याः पाल्याः पोष्याच सर्वदा। (बृहत्पराशरस्मृति ५। २३)
गौओं का सदा दान करना चाहिये, सदा उनकी रक्षा करनी चाहिये और सदा उनका पालन-पोषण करना चाहिये ।

गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः।
तस्मै तुष्टा: प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान्॥ (महाभारत, अनु० ८१।३३)
गोषु भक्त लभते यद् यदिच्छति मानवः।
स्त्रियोऽपि भक्ता या गोषु ताश्च काममवाप्नुयु:॥
पुत्रार्थी लभते पुत्र कन्यार्थी तामवाप्नुयात्।
धनार्थी लभते वित्तं धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात्॥
विद्यार्थी चाप्नुयाद् विद्यां सुखार्थी प्राप्नुयात् सुखम्।
न किञ्चिद् दुर्लभ चैव गवा भक्तस्य भारत। (महाभारत, अनु० ८३।५०-५२)
जो मनुष्य गौओं की सेवा करता है, उसे गौएँ अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान करती हैं। वह गौभक्त मनुष्य पुत्र, धन, विद्या, सुख आदि
जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त हो जाती है। उसके लिये कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होती ।

निविष्ट गोकुल यत्र श्वास मुञ्चति निर्भयम्।
विराजयति तं देशं पापं चास्यापकर्षति॥ (महाभारत, अनु०५१। ३२)
गौओं का समुदाय जहाँ बैठकर निर्भयतापूर्वक साँस लेता है, उस स्थान के सारे पापों को खींच लेता है ।

यस्यैकापि गृहे नास्ति धेनुर्वत्सानुचारिणी ॥
मङ्गलानि कुतस्तस्य कुत्तस्तस्य तमः क्षय:। (अत्रिसंहिता २१८-२१९)
जिसके घर में बछड़े सहित एक भी गौ नहीं है, उसका मंगल कैसे होगा और उसके पापों का नाश कैसे होगा?

‘गौएँ स्वर्ग की सीढ़ियाँ हैं, गौएँ स्वर्ग में भी पूजी जाती हैं, गौएँ समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली देवियाँ हैं, उनसे बढ़कर और कोई श्रेष्ठ वस्तु नहीं है।'
—(महाभारत, अनु० ५१ । ३३)

'जिसके घर में बछड़े सहित एक भी गौ नहीं है, उसका मंगल कैसे होगा और उसके पापों का नाश कैसे होगा ?"
—(अत्रिसंहिता २१८ - २१९ )

'राजन्! जो प्यास से व्याकुल गायों के जल पीने में विघ्न डालता है, उसे ब्रह्महत्यारा समझना चाहिये।'
—(महाभारत, अनु० २४ । ७)

'जो नराधम मन में भी गायों को दुःख देने की इच्छा कर लेता है, उसे चौदह इन्द्रों के काल तक नरक में रहना पड़ता है। '
—(पद्मपुराण, पाताल० १९ । ३४ )

'राजन्! जो मनुष्य जान-बूझकर भगवान्‌ की निन्दा करता है और गायों को दुःख देता है, उसका नरक से कभी छुटकारा नहीं हो सकता।'
—(पद्मपुराण, पाताल० १९ । ३६ )

'गौ की हत्या करने वाले, उसका मांस खाने वाले तथा गोहत्या का अनुमोदन करने वाले लोग गौ शरीर में जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षों तक नरक में डूबे रहते हैं।
(महाभारत, अनु० ७४ । ४)

'गोभक्त मनुष्य जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त होती है। स्त्रियों में भी जो गौओं की भक्त हैं, वे मनोवाञ्छित कामनाएँ प्राप्त कर लेती हैं । पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्या । धन चाहने वाले को धन और धर्म चाहने वाले को धर्म प्राप्त होता है । विद्यार्थी विद्या पाता है और सुखार्थी सुख । भारत ! गोभक्त के लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं है ।'
—(महाभारत, अनु० ८३ । ५०-५२ )

'जो गौओं को प्रतिदिन जल और तृण सहित भोजन प्रदान करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है।'
—(बृहत्पराशरस्मृति ५। २६-२७ )

विशेष—
वास्तव में कुत्ते-बिल्ली आदि का घर से बाहर पालन करना, उनकी रक्षा करना दोष नहीं है, प्रत्युत में प्राणिमात्र का पालन-पोषण करना मनुष्य का विशेष कर्तव्य है । (यदि वह कुत्ते-बिल्ली मनुष्यों तथा किसी निर्दोष जीवन को हानि न पहुंचा रहे हों तब) ।
परन्तु कुत्ते-बिल्ली आदि के साथ घुल-मिलकर रहना, उनको साथ में रखना, उनका स्पर्श करना, उनमें आसक्ति करना, उनसे अपनी जीविका चलाना आदि यह सब महापाप हैं ।

"शिवार्पणमस्तु"
-ASTROLOGER MANU BHARGAVA 

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

पशुओं के अकारण रोने का रहस्य...

 प्रायः देखने में आता है जब कभी हमारे घर के आसपास कोई कुत्ता,बिल्ली आदि पशु यदि असमय ही विलाप करने लगते हैं तो हमारे घर के बड़े बुजुर्ग हमसे कहते हैं कि कोई अशुभ घटना घटित होने वाली है, क्योंकि कुत्ते, बिल्ली आदि का रोना शुभ नहीं माना जाता।


मैकाले द्वारा बनाई गई शिक्षा नीति से प्राप्त शिक्षा के कारण हिन्दू युवा पीढ़ी उनकी इन बातों को अंधविश्वास का नाम देकर उनका उपहास उड़ाती है। ऐसे में क्या इन जानवरों के रोने के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार छुपा हुआ है या हमारे बड़े बुजुर्ग अंधविश्वासी हैं ? आइये जानते हैं...

मनुष्य अपने नेत्रों से वैज्ञानिकों द्वारा ज्ञात Electromagnetic Spectrum के एक छोटे से अंश को ही देख पाता है । इस Visible light Spectrum की सीमा 380 नैनोमीटर से लेकर 750 नैनोमीटर तक ही होती है, जिसमें 7 रंगों का समावेश होता है, जिसका संयुक्त स्वरूप हमें श्वेत रंग के रूप में प्राप्त होता है।


जबकि बहुत सारे पशु-पक्षी और यहां तक कि मछलियां तक इस सीमा से पार भी देख पाते हैं, ऐसे में वह उन शक्तियों को देख लेते हैं जिनको मनुष्य अपने नग्न नेत्रों से नहीं देख पाता और वह पशु-पक्षी भयभीत या विचलित होकर असामान्य सा व्यवहार करने लगते हैं।

जब भी किसी स्थान पर निकट भविष्य में किसी की मृत्यु होने वाली होती है अथवा भयानक आपदा आने वाली होती है तो वहां के वातावरण में एक प्रकार की खिन्नता छा जाती है, जिसका कारण है कि वह स्थान उसके मृत सगे सम्बन्धियों, मृत शुभचिंतकों एवं मित्रों की आत्माओं से भर जाता है और वह आत्माएं उसे अपने साथ ले जाने के लिए वहीं एकत्र हो जाती हैं।


जिसके कारण अनेक बार मरणासन्न व्यक्ति मूर्छा की अवस्था में अपने परिवारजनों को यह बताये हुए देखा जाता है कि मुझे लेने मेरे मरे हुए मित्र या सगे सम्बन्धी आये हुए हैं और मुझे बुला रहे हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार मृत व्यक्तियों को लेने के लिए हमें यमदूतों के आने का भी विवरण प्राप्त होता है। ऐसे में यह दृश्य देखकर कुत्ते, बिल्ली आदि पशु रोने तथा विचित्र प्रकार का क्रंदन करने लगते हैं।

अनेक बार जब मौसम वैज्ञानिकों ने ऐसे जीवों के व्यवहार का अध्ययन किया तो यहां तक पाया कि जब भी कोई भूकम्प, सूनामी या चक्रवात आदि आने वाले होते हैं जो अनेक जीव पहले से ही असामान्य व्यवहार करने लगते हैं जिसका कारण उनके Sensors का हमारे Sensors से अधिक Active (जाग्रत) होना होता है। उदाहरण स्वरूप- वर्षा आने से पूर्व चींटियों का अपने अंडे लेकर उस स्थान को छोड़ देना ।

बहुत सारे अज्ञानी मनुष्य जो आत्माओं पर विश्वास नहीं करते उनको यह अवश्य जान लेना चाहिए कि Energy (ऊर्जा) कभी समाप्त नहीं होती, बस वह एक स्वरूप (Form) से दूसरे स्वरूप में परिवर्तित हो जाती है और आत्मा भी एक Energy ही है, जो कभी नष्ट नहीं होती, बस शरीर बदलती रहती है। इसलिए श्रीमद्भागवत् गीता में आत्मा के विषय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि...


वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
    तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।2.22।।
अर्थात-
जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
           न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।2.23।।
अर्थात-
इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और न अग्नि इसे जला सकती है ; जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।

अब अपने विषय पर पुनः लौटते हुए बात करते हैं उन पशुओं की जिनके व्यवहार में हम अचानक से ऐसे परिवर्तन देखते हैं।

ऐसे पशुओं के व्यवहार में अचानक से आये इन परिवर्तनों का कारण यदि उनका चोटिल हो जाना, उनके बच्चे आदि की मृत्यु हो जाना हो तब तो यह सामान्य बात है परंतु यदि यह कारण नहीं है तो समझ लेना चाहिये कि कुछ ही समय में कोई विपत्ति आने वाली है।

ऐसे में उन पशुओं को वहां से भगाने के स्थान पर अपनी तथा घर की Aura (आभामंडल) को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए तथा पहले से ही जिनके आधीन ब्रह्मांड की समस्त नकारात्मक शक्तियां रहती हैं ऐसे कालों के भी काल, भगवान शंकर का भवानी सहित ध्यान करके उनसे विपत्ति को टालने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ।

"शिवार्पणमस्तु"

-Astrologer Manu Bhargava